श्रीमाणिक जय माणिक।
हर माणिक हरि माणिक।
चिन्माणिक सन्माणिक।
हर माणिक हरि माणिक।।
पद
आत्मा एकचि सर्वांतरी हो।
आम्हां कोण शैव वैष्णव हो।
आम्हीं सकलमतां वंदू हो।
(चाल) चेतनीं त्रिविध भेदाचा लेशही नाहीं।
हा स्वानुभव घेऊं आम्हीं बाई॥1॥
आत्मा मतधर्मीही (शैव भागवत) नाहीं।
या जडभूता मीपण नाहीं।
अवघा घातक भ्रम हा बाई।
(चाल) या कोशा सोडूं जसा कीटक सोडुनि जाई।
तरि खचितचि मुक्त आम्हीं बाई॥2॥
प्रिय (जन) हो जो तुमचा प्रिय आत्मा।
विठ्ठल शिव भगवति तो आत्मा।
आह्मां तोचि वंद्य जगदात्मा।
(चाल) महावाक्या शोधूं जेथे भेदमत नाहीं।
मग घेऊं आत्मसुख बाई॥3॥
फळल्या बहुपुण्याच्या गांठी।
शिणले वेदशास्त्र या साठी।
हें सुख नाहीं स्वर्गी वैकुठीं।
(चाल) चेतनीं दृश्य जड भेद हा वितळुनि जाई।
जग अवघे चिन्मय बाई॥4॥
जन हो हें जग आपणचि होऊं।
आपणां आपणचि गाऊं ध्याऊं।
निशिदिनिं हेंच गीत आम्हीं गाऊं।
(चाल) तमनाशक चिन्मार्तांड उगवला बाई।
या सौख्या अंतचि नाहीं॥
पद
किति सुख हे किती किति सुख हें। हरिहरांचेही हितगुज हें॥ध्रु.॥
कपिल जनक
जडभरत दिगंबर। वामदेव शुक धन हें॥1॥
महावाक्य श्रवण मनन साधन। स्वानुभव
सार निज हें॥2॥
तूर्या उन्मनि सुलीन समाधी। चरमवृत्ति भूषण हें॥3॥
सच्चित्सुख माणिक मार्ताण्डा। पूर्ण गुरुकृपा फल हें॥4॥
पद
आता जाऊं चला आम्हीं पाहूं चला। गुरुराज प्रगट प्रभुराज प्रगट अवधूत आला। बोलुं
चला आणि प्रार्थु चला। हा निर्विकल्प सविकल्पीं आला॥ध्रु.॥
घेति पत्र पुष्प
फल जल गंध मणि मोती। आणि नटुनि म्हणति आता वाहूं चला। शीघ्र चलाअति शीघ्र
चला। हा निर्विकल्प सवि कल्पीं आला॥1॥
कोणि हार तुरा मौक्तिक गजरा।
रत्नकटक मुगुट शिरिं घालूं चला। मागूं चला धन पुत्र सुख। हा निर्विकल्प सविकल्पीं
आला॥2॥
कोणि मागे गुजमंत्र योग ध्यान ज्ञान तंत्र। नको जन्म परतंत्र पदीं
रमूं चला। ज्ञानरूप मार्तांड प्रभू। हा निर्विकल्प सविकल्पीं आला॥3॥
जागृती भोग हा क्रमिला।
कल्पित प्रपंची रमला।
बहुरूपे एकचि नटला।
नोळखे आत्मशक्तीला।
भोगत्रयि एक चिदात्मा॥3॥
कोण मी नकळे अज्ञानी।
शरणागत विद्वच्चरणी।
बोधामृत पडलें श्रवणीं।
मी धन्य मी ब्रह्मज्ञानी।
बहुरंगी हा सर्वात्मा॥4॥
श्रीसकलमतप्रभु आले।
स्मितहास्यें वच हें वदले।
कोण बद्ध मुक्त जगिं झाले।
नसतेचि नाहिंसें झाले।
नित्यमुक्त सहजसुख सीमा॥5॥
मंगलादि मंगल शक्ती।
मंगल मुख मानस वृत्ती।
मंगल शिव मायिक स्फूर्ती।
मंगल हो सहज स्थिति मुक्ती।
मंगलरूपीं मंगलधामा॥6॥
आळवी तूं चेतन देवा।
हांक देई धावा धावा।
द्या सहजमुक्तिचा ठेवा।
जरि जन्मांतरि घ्या सेवा।
पूर्णादि पूर्ण परमात्मा॥7॥
मार्ताण्डप्रभें तम हरलें।
धुंडिता जीव भ्रम न मिळे।
ब्रह्मगान श्रवणीं रुचलें।
ज्ञानाब्धि सहजचि उसळे।
सच्चित्सुख जगदभिरामा॥8॥
पद
हा शैव नव्हें मनुजाधम मूढ तो ऐका।
मी सांब नव्हें कोण मी धरी जो शंका॥ध्रु.॥
ब्रह्मादिस्तंब जड शक्ति हीच शाळुंका।
चैतन्यलिंग शिव अलिप्त माया पंका॥
अवकाशरूपिणी कामेश्वरी वामांका।
हा वृत्तिप्रवाह गंगाजल भवनौका॥
दृग् विषय भोगवी चेतन मी सांब।
अंतरी प्रकृति गुण साक्षी मी सांब।
जगि सुषुप्ति लय सुखदातामी सांब।
मत्सन्निधान सत्ता ही विद्या क्षणिका।
मज अनंतवेषे सुखवि कुशल जशी गणिका॥1॥
हे पंचभूत मी पंचमुखी शिवराणा।
मनप्रवाह चेतवी परि न धरी अभिमाना॥
कधि दु:ख भोगि कधि विनोद करि शिवगाना।
मनशिशु खेळ खेळोनि येई शिवसदन आत्मनिजसदना॥
ईशान रुद्र मृड अष्टमूर्ति मी सांब।
भ्रम भस्म चर्चि शिवदीक्षा मी सांब।
स्त्री पुरुष सर्व हें जगदंबा आणि सांब॥
कैलास देह मी जगदात्मा मग भय कां?
भूलिंग ज्ञानमार्ताण्ड सत्य शिव डंका॥2॥
पद
मायामलधूत आम्ही अवधूत। दृश्य पंचभूत जाणूं आम्ही॥ध्रु.॥
जाणूं आम्हीं
स्वप्न सुषुप्ति जागृती। जन्म-मरण-भीति नाहीं आम्हां॥1॥
नाहीं आम्हां देह
वासना संबंध। कैंचा मोक्षबंध चिदाकाशी॥2॥
चिदाकाशी चित्र निर्गुण सगुण।
आम्हीं ब्रह्म पूर्ण सत्य ज्ञान॥3॥
ज्ञानमार्ताण्ड हा बोध अभंग। झाला भवभंग
हरपली माया॥4॥
आत्मभावा सृष्टिभावा। त्रिपुटीभावा मूळ तो आत्मा। आत्मज्योति
नामरूप दावी। चिद्विलास सहजानंद॥2॥
चिन्मार्तांण्ड किरणीं बहुरंग हे।
नाटकी चित्र नटे हा आत्मा। एक पूर्ण जवळीच प्रभु हा। सहजमुक्त सहजानंद॥3॥
पद
कधि पाहीन मी माझ्या स्वस्वरूपाला। आनंदपूर्ण ब्रह्माला। कधि बोधिल हा भवमोचक
गुरु मजला। ऐकेन मी महावाक्याला॥ध्रु.॥
आज दिपवाळी जन्मदिवस उगवला।
भेटला कीं श्रीगुरु मजला। बहुजन्माचा भाग्योदय हा झाला। जीव ब्रह्मरूप शिव
झाला।
॥चाल॥ किती वर्णू मी सुख हे अहाहा। संगीत साम हा ऊ हा। धन्य धन्य बोधक गुरु
हा। मिठी घालीन मी परशिव घनरूपाला। ज्ञानरूप मार्ताण्डाला॥1॥
पद
झालों आम्ही बहु धन्यरे। भेटलें सगुण हें ब्रह्म रे॥ध्रु.॥
नको उदास स्थिति
ती मुक्ती। ही माया आम्हां प्रिय भक्ती॥1॥
महावाक्य नको हें आम्हां।
घेऊं तुझ्या सुमंगल नामा॥2॥
नको वियोग तूझा देवा। जन्मजन्मीं घे तुझी
सेवा॥3॥
तू जीवन या ब्रह्मांडा। तूं प्रकाश चिर्न्मांडा॥4॥
पद
धन्य धन्य अति धन्य धन्य आम्हीं झालो पूर्णानंद।
बंध मोक्ष भ्रम कोण तो जाणे अवघा ब्रह्मानंद॥ध्रु.॥
जागृति विषयी सुख जें होते तोचि विषयानंद।
स्वप्नी अनेक रूपे नटतो तोचि वासनानंद।
घनीभूत वृत्ति जी सुषुप्ति तोचि योगानंद।
मायिक भोग अवस्था पाहतां एकचि निज आनंद॥1॥
महावाक्य बोधे अनुभव जो तोच विद्यानंद।
समाधि सुख निर्विकल्प योगी तोचि सहजानंद।
वृत्तिस्फूर्तिविरहित जे उरलें तोचि स्वरूपानंद।
भूत भेद भ्रम मायिक पाहतां घन अद्वैतानंद॥2॥
अनेक क्षण मन उपाधि भेदे अनेक सुख गमलें।
शांत रज तम वृत्ति निविृत्ति एकचि सुख भरलें।
ज्ञानरूप मार्ताण्ड उगवतां संशय तम हरलें।
चिन्माणिक आम्हीं सर्वहि झालो आनंदी आनंद॥3॥
पद
हंस: सोऽहं सोऽहं हंस:।
अजपाजप सद्ब्रह्म प्रकासा।
ध्यात जपत जो अजपामाला।
सहज खेल जग स्थिति लय लीला।
सिद्ध मंत्र बल ज्योति प्रचंडा।
दे उपदेस ज्ञानमार्तांडा॥1॥
अस्त समय शिव नाचत प्यारा।
शांभवगण शिव हर ललकारा।
अखिलकोटि दीपक ब्रह्मांडा।
ज्योतिरूप शिव चिन्मार्तांडा।
निजानंद ईशभूति दायक।
अभेद शिव माणिक जय माणिक॥2॥
माणिक माणिक जय गुरु माणिक।
माणिक माणिक शिव हर माणिक॥
पद
श्रीगुरु माणिक जय गुरु माणिक। हाचि गुरुउपदेश मुख्य आम्हां। दान व्रत यज्ञ हे
स्नान गंगा। सोमपान मधुअमृतरस सेवुं नामा॥ध्रु.॥
पुण्य जय सत्कीर्ति
दक्षिणोत्तर मार्ग। हेचि अमनस्क हट तारकादि। ज्ञान हें ध्यान हें महावाक्य भजन
हे। भक्तकल्पद्रुमा सार्वभौमा॥1॥
क्षेत्र माणिक मंत्र तीर्थ संगम वास।
भिक्षान्न अवधूत भजन द्या देवा। बोध मार्तण्ड हा विश्वहृदयीं वसो। जन्मोजन्मीं
हेंचि दान द्या देवा॥2॥
पद
अरे जा श्रीप्रभु रिझवा। हे वय जाते अहा हा हा॥ध्रु.॥
अहा तारुण्य मद धन हे
कुणा हो शेवटा नेले। क्षणिक हो रंग हा हिरवा। हे वय जाते अहा हा हा॥1॥
अहाहा या विषयभोगा किती हो दीन तुम्ही झालां। हे जन हो, स्वानुभव आठवा। हे वय
जाते अहा हा हा॥2॥
स्वकर्में चालते जग हे प्रिय स्त्री मित्र सुत बंधु। अशा
बोधे मना फिरवा। हे वय जाते अहा हा हा॥3॥
पहा हो कल्पजीवी शूर कवि राजे
कुठें गेले। मी मोठा दंभ हा हटवा। हे वय जाते अहा हा हा॥4॥
महायोगी
तपस्वी हे कसे एकांत सुखवासी। तसा एकांत सुख सेवा। हे वय जाते अहा हा
हा॥5॥
शरण जा बोध चिन्मार्तांड। रूपा पूर्ण तुम्ही जाणा। निजानंदा मनीं
ठसवा। हे वय जाते अहा हा हा॥6॥
पद
विसरूं जरि या चरणा हे प्रभो तरि द्यावें मरणा हे प्रभो।
देह पडो दुर्मरणचि येवो न करूं तव स्मरणा हे प्रभो॥ध्रु.॥
शतमख जरि केलों विधिने वेद स्तविजेलों विधिनें।
धीश सुरेश महेशहि झालों परि पावो पतना।
हे प्रभो जरि न करूं नमना हे प्रभो॥1॥
परसिद्ध्या वळल्या आपणचि गुरुपद मज आलें आपणचि।
योग जळो आणि ज्ञान जळो तें जी न करी भजना।
हे प्रभो झडू दे ती रसना हे प्रभो ॥2॥
रौरव नरक घडो या देहींच मुखिं बहु कृमी पडो या देहींच।
निंदा जरि करूं निजगुरुस्थाना आणि डोलवूं माना।
हे प्रभो नरककूप कानां भो हरि॥3॥
टाकुनि गुरुमंत्रा कुमतिनें पूजूं सुरयंत्रा सुमतिनें।
माणिक माणिक हा जप सोडुनि आणिक धरूं ध्याना।
हे प्रभो न्यावेयमसदना हे प्रभो॥4॥
सेवक हा तुमचा हो प्रिय बोला मुखें ‘आमुचा हो प्रिय।
ज्ञानरूप मार्तांडस्वरूपीं अभेदमति जडूं द्या।
हे प्रभो सेवा ही घडू द्या हे प्रभो॥5॥
अवधूत भजा अवधूत। ब्रह्म होती हे भूत सहज। अवधूत भजा अवधूत। मायामल निर्धूत
सहज। अवधूत भजा अवधूत॥ध्रु.॥
निरालंबी आलंबन करि जो। तोचि शुद्ध अति
पूत॥1॥
परमहंस सनकादिक वंदिती। जगभरित महद्भूत॥2॥
भक्तकार्य
कल्पद्रुमगुरु हा। विधि हरि हर पदीं विनत॥3॥
प्रिय मार्ताण्डाकार एक
सुख। चिन्मय ओतप्रोत॥4॥
पद
कुणि आणा हो भक्तसखा (दीनप्रभू) तो आणा। चैतन्य देशिंचा (आनंद देशिंचा)
राणा॥ध्रु.॥
जन भुलला हो निज मायेनें भुलला। महाविषय मृगजळीं बुडला। या
पंचभूतां सत्य कल्पुनी रमला। बहु जन्म जन्मुनी गेला॥1॥
मोहशक्तीनें (मोह
वैर्यानें) जीवा घातचि केला। प्रिय (जन) स्वस्वरूपां हो मुकला। जग (जन) उपकारा
जाउनि त्या श्रीचरणां। या भवदु:खा वाखाणा॥।
(चाल) कोणि विश्वां हितगुज सांगा। मी देह (जीव) बुद्धि ही त्यागा। जा सच्चिदानन्द
पदीं लागा। ज्ञानमार्ताण्डा दिव्यदृष्टिनें (आत्मदृष्टिनें) जाणा। जग ब्रह्म
हेंचि मनिं आणा॥2॥
पद
आतां जाई रे शरण
जरि धरिसि चरण
दूर जन्ममरण
करी गुरुची कृपा।
टाकुनियां गुरु सार्वभौम हा
कां रे तूं पसरिसी कर हे नृपा॥ध्रु.॥
हा देह शकट
अस्थि मांस प्रकट
पहा सकल हे घट
जन्ममृत्यु जरा।
कालचक्रिं गुंतले जीवशिव
शिवशिवशिव कधि येतील घरा।
हे स्त्री पुत्र धन देह लोभांचे बंधन
येंणे पावसी पतन करि शीघ्र त्वरा।
ज्ञानामृत पिऊनी सुखी हो
कितितरि सेविसि विषय गरा।
बहु वाढविले तंत्र
किती जपसी हे मंत्र
परि होसी परतंत्र
धरि श्रीगुरुजपा॥
टाकुनियां गुरु सार्वभौम हा
कां रे तूं पसरिसी कर हे नृपा॥1॥
पहा स्थूल सूक्ष्म गति
गुण अवस्था जागृति
स्वप्न सुषुप्ति उत्पत्ति
स्थिति लय व्यवहार।
पंचभूत माया विद्या त्रै-
कालिक मिथ्या करि तूं विचार।
तूंचि पंच महापापी
वेदतयालगीं शापी
बोले जग द्वयरूपी
भेद करी व्यवहार।
ज्ञानरूप मार्तांड प्रकाशें
द्वैतदृष्टिचा करि संहार।
मुळी झालाचि नाहीं
मग कैची भव फांशी
गुरुवाक्य उजळिसी
या ज्ञानदीपा॥
टाकुनियां गुरु सार्वभौम हा
कां रे तूं पसरिसी कर हे नृपा॥2॥
पद
नमो पूर्ण सुखभरित चैतन्यधामा।
सच्चिदानंद गुरु सार्वभौमा॥ध्रु.॥
एक सद्वस्तु घन अविट अज निजरूप।
अनृतमय जगदखिल भावशून्य।
सिद्ध सिद्धांतपर सूक्ष्मतर निर्मला।
निष्कला स्वानुभव वेदमान्या॥1॥
ऐका विनवणी तुम्हीं संतभूप। भेदनामरूप एक तो आत्मा॥ध्रु.॥
रामकृष्ण संत
सज्जन महंत। भक्त भगवंत एकरूप॥1॥
भक्ताचिया धूळी भगवंत लोळे। ऐक्याचे
सोहाळे व्यास तो वदला॥2॥
बोध मार्ताण्ड हा आज उगवला। भेदभाव गेला
आत्मानंदी॥3॥
पद
हम असंग चेतन सांई। ये दु:ख प्रवाह हम संग नाहीं॥धु.॥
हम आकाश नित जग को
आधारा। अचानक मेघ उठत जलधारा। दिखत छुपत अंधियार उजाला। हम न किए न
मिटाई। ये दु:ख प्रवाह हम संग नाहीं॥1॥
इह संसार खिलौना मन का। मन
कंजाल है चेतन जल का। जल की न हानि न लाभ है तिनका। जूं नट दीप नचाई। ये
दु:ख प्रवाह हम संग नाहीं॥2॥
जल चाहत नहीं तरंग फेसा। घटत बढत जूं दिन दिन
सांसां। होत जात भूतन में तमासा। हम न रिझे न रिझाई। ये दु:ख प्रवाह हम संग
नाही॥3॥
आद ब्रह्म गुरु मानिक हंसा। सो गुरु चिन्मार्ताण्ड प्रकासा।
निराकार अरु दे उपदेसा। ये चेतन चतुराई॥4॥
पद
हात जोर बिनती यही करहुं सब जिवनको भाई। जीव तुम नहीं ब्रह्मरूप सांई॥ध्रु.॥
चिदाकास आतमकी संगति पंचतत्त्व बन आई। तेज सो रूप रूप दरसाई। मान वृत्ति इद्रिय
द्वारे ये भोगनको ललचाई। चौर्याशी लख योनि फिरवाई। कामिनी धनसुत महाल मंदिर देख
जगत चतराई। अविद्या आतम सुख विसराई। अलख निरंजन गुरु का डंका सुनले देत
दुहाई। जीव तुम नहीं ब्रह्मरूप सांई॥1॥
पंचभूत ब्रह्मांड पिंड अरु माया मोह
बढाई। ब्रह्म तुम दृश्य की मौज मचाई। जूं सपनामों राजभोग अरु संपत झूठ
लुटाई। कौन मृगजलसो प्यास बुझाई। निरंकार शिव शक्ति एक अवधूत सकल जग मायी।
नामरूप ब्रह्मबिना कछु नहीं तुमहिं जीव ईश परमात्मा महिमा बरनी न जाई। कहो कब निशिनें
सूरज छाई। ज्ञानरूपमार्तांड गुरु सत् बेदबानी समझाई। जीव तुम नहीं ब्रह्मरूप
सांई॥2॥
पहा किती दैव उघडलें आमुचें। देखिलें रूप श्रीप्रभुचें॥ध्रु.॥
हा विश्वरूप
गिरिधारी। निजकृपें जीव हे तारी। ही माय जगां उपकारी। अति संकट सर्वहि वारि।
मी सकलमतस्थापक हें। गाजवी ब्रीदही पाही॥1॥
अहो चला चला आम्ही जाऊं।
डोळ्याने रूप हें पाहूं। श्रीहस्तें प्रसाद घेऊं। मग जन्मवरी सुखी राहूं।
पूजनें धन्यता लेवू। स्वस्वरूपसुख हें घेऊं॥2॥
हा सगुण देह श्रीगुरुचा।
मग पहाया न मिळे साचा। हा कंद निजानंदचा। ज्ञानरूप मार्तांडाचा॥3॥
पद
नमितों ज्ञानपुंज पदकमलां। वदतों लीला। प्रभु हा हरि हा, विधि हा, शिव हा, एकचि
झाला॥ध्रु.॥
झाला माणिक करितो निजलीला। प्रभु हा, हरि हा, विधिहा शिव हा,
एकचि झाला॥1॥
सकलमतासीं स्थापक तो गुरु। भक्त काम पुरवाया सुरतरु।
जगकल्याणीं झाली कथा। ती ऐका। मनसा, वचसा, सुरसा, वदतों लीला॥2॥
सच्चिदानंद कंद विजय तूं। ज्ञानरूप मार्तांड गुरू तूं। या भवकाननीं दावि
पथा। ती ऐका। मनसा वचसा सुरसा वदतों लीला॥3॥
पद
योगशक्तिचा वर्णिन महिमा वंदुनि गुरुमाणिका। झाला विश्वरूप आइका॥ध्रु.॥
विदुरग्रामीं सकलजातिनीं प्रार्थियलें प्रभुवरा। यावें श्रीप्रभु आमुचे घरा।
ब्राह्मण हो अतिशूद्र स्त्रिया बहु वाईट अथवा बरा। परंतु सेवक जन हा खरा।
सकलमतासी स्थापक तूं जरि, शमवी आमुच्या भुका। घ्यावें अद्भुत या लौकिका॥ झाला
विश्वरूप आइका॥1॥
ऐकुनि श्रीप्रभु हास्य वदन करि बोले मधुर ध्वनी। न व्हावें
निष्ठुर आपुल्या मनीं। एक्या कालिंच सदनीं तुमच्या शिष्यांसह येउनी। द्याल तें
घेईन प्रिय मानुनी। ऐकुनि सर्वहि गेले निजघरा। पाहती त्या कौतुका॥ झाला
विश्वरूप आइका॥2॥
योगशक्तिनें तो प्रभु आपणचि अनेक रूपा धरी। प्रगटला
सर्वांच्या मंदिरीं। कोठें वस्त्र धन पुष्पचि घेतो, कोठें भोजन करी। परि तो एकचि
सर्वां घरी। अद्भुत लीला श्रीप्रभुची ही न वर्णवे ब्रह्मादिकां॥ झाला विश्वरूप
आइका॥3॥
अन्य गृहांप्रति अन्य येउनि श्रीप्रभूसी पाहिलें। पाहतां स्वगृहींहि
देखिले। विदुरग्रामीं विश्वरूपधृत श्रीप्रभु अवलोकिले। ऐका अद्भुत हे
वर्तलें। ज्ञानरूप मार्तांडगुरु हा खेळ दाविला निका॥ झाला विश्वरूप
आइका॥4॥
पद
धन्य धन्य अति धन्य आम्ही। श्रीमाणिकपदीं लीन आम्ही॥ध्रु.॥
अज्ञ भयभीत हो काष्ठ
व्याघ्रासिया। ज्ञानसंपन्न सानंद क्रीडे॥ ईश सुर मुनिजन्म विश्व सौख्यादेत। मज
मृत्यु मी देहीं मानुनी शिणला॥2॥
दु:ख विपरीत सुख शांति क्रोधा वैर। तेज तम
वैर हा स्पष्ट भासे। हीन बलि भयचकित रण वीर तन त्यजित। वृत्ति गुण दोष हा पूर्ण
ठसला॥3॥
वृत्ति व्यापार सह, वृत्तिस्थिति लय जन्म। भासवी जाणता मी चिदात्मा।
वृत्तिभोगी दु:ख, ती क्षणिक मी अमर। नित्य निरपेक्ष मार्तांड स्फुरला॥4॥
पद
नेति नेति नाहीं येथें शास्त्रप्रसंग। आत्मा असंग। नको कुसंग। साधुचा
संग। मन बुद्धि चित्त वाणीचा नाहीं आम्हा संग॥ध्रु.॥
आम्ही कूटस्थ देहा जन्म
आहे। जलीं आकाश अलिप्त राहे। ज्ञानरूपी ज्ञातता न साहे। येथें पाहिजे
जातीचें स्वानुभव अंग। आत्मा असंग। नको कुसंग। साधुचा संग। मन बुद्धि
चित्त वाणीचा नाहीं आम्हा संग॥1॥
आम्ही जन्मोनि नाहीं जन्म आम्हां। वृद्धि
सूतक नाहीं स्वप्न जन्मा। शब्द संबंध नाहीं परब्रह्मा। चिन्मार्तांड जलिं जग भासे
तरंग। आत्मा असंग। नको कुसंग। साधुचा संग। मन बुद्धि चित्त वाणीचा
नाहीं आम्हा संग॥2॥
बहुपुण्य हा दिन उगवला। शिव साम्राज्य पदीं जीव
आला। अहा आनंदी आनंद झाला। खेळू गुलाल श्रीगुरुपूर्ण बोधाचा रंग। आत्मा
असंग। नको कुसंग। साधुचा संग। मन बुद्धि चित्त वाणीचा नाहीं आम्हा
संग॥3॥
पद
कां कुणावरी कोप हा बाबा।
कां मीपणीं प्रेमा जडला।
नरनारी जगदाकृति एकचि।
चेतन प्रभु शिव हा नटला॥ध्रु.॥
अनंत प्रकृति स्वभावरत जन
अधमोत्तम विषयीं रमला।
न्यायवाक्य श्रीकृष्ण वदे हो
मुनि योगी निग्रही फसला॥2॥
शुक वसिष्ठ सनकादिक गण हा
जीवन्मुक्ति सुखा शिणला।
जीव जंतु निद्रा समयीं हो
सहज मुक्त ब्रह्मीं मुरला॥1॥
विदेह मुक्ति प्रारब्धक्षय
वांच्छित ज्ञानीं बहु श्रमला।
अलिप्त स्वस्वरूपीं जग स्थिती लय
मानुनि मुनि करी निज लीला॥4॥
गुण स्वभाव बल काल ज्ञाता
जनहितधर्मा ज्या स्तविला।
अन्य कालगुण स्वभावभेदें
अनहित जाणुनि तो त्यजिला॥5॥
ईशकृपा वांच्छित स्वस्वमति
वंद्य निंद्य (विधि-निषेध) वचनीं भ्रमला।
सकलमत प्रभु एक जो जाणें
तो जगि सकलमतीं नमिला (पूजिला स्तविला )॥6॥
मोक्ष सिद्ध सत्कर्म धर्म गुरु
शास्त्र जाल बंधनिं विटला।
सकलमत स्थापक शिव माणिक
चिन्मार्तांड पदीं मुरला॥7॥
पद
अभाग्याच्या हृदयीं मीपणीं परब्रह्म स्फुरले। परि त्या लोटुनि या जडदेहीं मीपण हें
जडले॥ध्रु.॥
मी देही जड जीव ज्ञान हें केविं होत समजा। जागृति स्वप्न
सुषुप्ति जाणते कोण तुम्हीं उमजा। मन इंद्रिय मुरडोनि प्रेरितां स्वहित विषय
काजा। आत्मशक्ति बल सर्व जाणतां म्हणतां मज न कळे॥1॥
आत्मतेज मन विवर्त कीटक
दृश्य जाल स्फुरवी। ऊर्णनाभि मृगवारि अभ्र जसें कोश पंच नटवी। स्वात्मशक्ति
वृत्ति प्राण निपजुनि विषयीं मना रिझवी। ज्ञानसिंधु लाटा पाहुनी जन स्वात्मरूपा
भुलले॥2॥
श्रुति प्रज्ञानंब्रह्म हे गर्जंति विषयीं हो ऐका। शब्द रूप रस गंध
ज्ञान हे ब्रह्मतेज कणिका। मीं तूं पण सुख दु:खाकृति ही माया भव क्षणिका। ईश जीव
जड दृश्याकृति ही ब्रह्म तेज भरलें॥3॥
कोण बद्ध कोण मुक्त ज्ञानी अनुभविं हो
बोला। अमत ब्रह्म तोचि मुक्त सहजि वेद पुरुष वदला। वसिष्ठ रामा वदे स्वप्नि जशी
कथा जननि बाला। चिन्मार्ताण्ड प्रसादें मींपणी ब्रह्म पूर्ण ठसलें॥4॥
पद
अस्ति नास्ति कुणि म्हणा परंतु, तें आहे बा तें आहे। चेतन जड कुणि म्हणा परंतु
(ईश जीव जड म्हणा परंतु) तें आहे बा तें आहे॥ध्रु.॥
ज्यामुळें हे मिथ्या
म्हणती। मौन वाच्य प्रतिपादिती। निश्चय अनुभव असो नसो परी। तें आहे बा तें
आहे॥1॥
जो शून्य निधि शोषवी। मींपणीं रूप प्रगटवी। नास्तिका प्राण
जीववी। नेति नेति श्रुति सौभा़ग्यप्रद। तें आहे बा तें आहे॥2॥
जाणिवे
क्रिये नातुडे। वाच्य लक्ष तर्कही खुडे। वेदहि थकती बापुडे। नाहीं पण
वृत्तिही बुडे परि। तें आहे बा तें आहे॥3॥
निरपेक्ष स्फुर्तिचे
स्फुरणें। नि:शंक स्वानुभव वदणें। सत्यानृत हें भाषणें। ब्रह्म जीव शून्य
साक्षि अवघें। तें आहे बा तें आहे॥4॥
स्वरूप चिन्मार्ताण्ड प्रकाशे।
शब्द मौनपणही ग्रासे। अस्ति नास्ति विकल्प नासे। अनंत नामे भजा परंतु। तें
आहे बा तें आहे॥5॥
पद
मी चेतन, चंचल नांहीं। मला समाधि नको ग बाई॥ध्रु.॥
आत्मशक्ति हें मन।
शांति विक्षेप मन। बंधमोक्ष हें मन। या मनाशीं नामरूप नाहीं। मला समाधि नको
ग बाई॥1॥
चिन्मार्ताणड प्रचंड। सिंधुलहरी उदंड। मन आत्म्याशी भेदची
नाहीं। मला समाधि नको ग बाई॥2॥
पद
तोचि धन्य जन्मा आला। जो कां सकलमतीं वंदिला॥1॥
एका देवा आदरावें। अन्य
देवा कां निदावें॥2॥
विश्वरूपीं देव राजा। नाना वेषीं भक्तकाजा॥3॥
जलिं तरंग नभीं वारा। नामरूपाचा पसारा॥4॥
दिवस घटिका पळ पळ जाणा। जन्म
नाश मनीं आणा॥5॥
विश्वरूपीं पांडुरंग। घडी घडी पालटे रंग॥6॥
गुण
उपासना अनंत। एक चालक चेतन संत॥7॥
विषय सर्व विठ्ठलार्पित। जगिं तोचि
सहज मुक्त॥8॥
ज्ञान मार्तांड हा भाव। सकल घटीं माणिक देव॥9॥
पद
भक्त देऊळाशीं गेला। हृदयीं देव विसरला॥1॥
देव चालक शरीरांतरि। भक्त
देवा हाका मारी॥2॥
भक्त ठेवी नैवेद्यासीं। देव अंतरि उपवासी॥3॥
भक्त देवा लागी शिणे। देवा वाटे लाजिरवाणें॥4॥
झाली देवा भक्ता भेटी।
तुटे जीवपणाची गांठी॥5॥
ज्ञानमार्तांडाची लीला। भक्त अवघा देव
झाला॥6॥
पद
कोण विपरीत प्रसंग ओढवला। सार्वभौम आला भिक्षा मागे॥1॥
पूर्ण परब्रह्म मागे
विषय भिक्षा। जन्ममरण शिक्षा अज्ञान संगे॥2॥
स्वप्निं गेल्या जीवा सती गेली
विधवा। मूर्ख संशय भावा सोडवी देवा॥3॥
आत्मा अविनाशी विषय प्रकाशी।
इद्रिय भोग ग्रासी जागृति स्वप्नीं॥4॥
विषय भोग नाना चिदात्मा मळेना।
जन्मेना नासेना मानस धर्मे॥5॥
जड ना संसारीं आत्मा निर्विकारी। भोग भ्रांति
वारि गुरु बोध वचने॥6॥
ईश जीव मी मी विषय भोगी मी मी। मजमाजीं मी मी स्फुरतो
आत्मा॥7॥
सकलमती भेटे अस्ति नास्ति प्रगटे। लोटितां न लोटे ज्ञानमार्ताण्ड
हा॥8॥
पद
जय हो सकलमतीं, तुम्हां जगिं मान्यता। पूज्यता सज्जन सुवंद्यता॥ध्रु.॥
सच्चिदानंद गुरु एकही साच और
इतर गुरु झूठ पहचानले रे मना।
माया विलास सब नाम और रूप त्यज
सकल जग परब्रह्म देखले रे मना॥ध्रु.॥
वोही जगरूप और वोही गुरुभूप मन
जीव शिवभूत पंचक त्रिगुण सारा।
एक सद्रूपही बहुविधा होत है
श्रुतिवाक्य वेदांत मान ले रे मना॥1॥
छांड शबलार्थ को शुद्ध सो ग्राह्य कर
भाग लच्छन महावाक्य साधे।
ब्रह्म जो जाने सो ब्रह्मही होत है
निगम डंकार सुन बूझले रे मना॥2॥
नित्यसो सत्य औ’ ज्ञान चैतन्य सुख
परम अत्यंत आनंद साजे।
अचल अविनास अज एक अवधूत गुरु।
ज्ञानघन मार्तांड जान ले रे मना॥3॥
पद
दिवाना आपकु नहि धूंडा॥ध्रु.॥
विद्या सीखी जोग कमाया। भगवा सिर
मूंडा॥1॥
ग्यानी बन चित्त भोगकी आशा। साधु जग भोंडा॥2॥
बंध मुगति
नहीं ब्रह्म तूं साचा। क्यों रोता रंडा॥3॥
आत्मभूमिबल मन फल फुली। शरीर
जडकुंडा॥4॥
त्यज विरोध मत, सकलमती हो। तबहो दिल थंडा॥5॥
चिन्मार्ताण्ड बचन जो भूला। खावे जम दंडा॥6॥
पद
झलक मुँह दिखा झट छुपा चाहते हो। मिले हो जो दिल से कहाँ जाते हो॥1॥
मै बंदा
हूँ दुश्मन या आशिक तुम्हारा। मैं मैं हूँ या तुम हो जुदा जानते हो॥2॥
खुदाई
खुदाको न छोड़ेगी हरगिज़। शक्ल हम नहीं कुछ तो क्या जानते हो॥3॥
मोहम्मद या
अहमद या मानीक बंदा। तुम्ही जो चाहे सो बन आते हो॥4॥
पद
हाय गफलत में हूँ मैं कैसा मुझे मैं भूल गया हूँ। ख्वाहिशें दिल की मिटाने हरसू दौड़
रहा हूँ॥ध्रु.॥
शाह वज़ीर है दिल मैं हूं मालिक दिल का। दिल से ही दीन दुनिया
ताबे दिल के हुआ हूँ॥1॥
हुबाब नूर है दिल, मै हूं दरयाएजलाल। मौज दरया का
तमाशा मै खुदी को खो दिया हूँ॥2॥
आंखों में नूर मुहम्मद दिल तो है खाने
खुदा। मैंपने का ढंग मचा के मन्नते माँग रहा हूँ॥3॥
खुल गया चश्म हकीकी
कल्मे गय्यब को समझा। लाइलाह इल्लिल्ला मे खुदबखुद फना हुआ हूँ॥4॥
मैं न
हिंदू न मुसलमाँ हूँ मै मानिक का प्यारा। मजहबे सूफी का बया कोई कहा न मैं कहा
हूँ॥5॥
पद
खुदा के वास्ते मुझ में खुदा बता देना। ये मैं का गफलत परदा जरा उठा
लेना॥ध्रु.॥
ये नूर किसका है हर चश्म में चमकता है। रसूल, महल मुबारक तवाफ
कर लेना॥1॥
तुम्हे नसीब हो मेराज शबे मुबारक हो। ये जिब्रइल है दिल आपसा बना
लेना॥2॥
वो लाशरीक हूँ अल्लाह में खुद फना भी फना है। ये जोश वस्ल निशाने
खुदी मिटा देना॥3॥
न बंदा हूँ न मानिक हर रंग मे खुदा ही खुदा है। फकीर सूफी
का नाजुक बयान सुन लेना॥4॥
पद
खुदा गर दे नजर तुमको, तो हर सूरत खुदा की है। जमर्रुुद गौहर औ’ शमशीर, मगर इक आबदारी
है। न आतिश ज़ात से रौशन न सूरज चांद तारे हैं। ये सिफते जिससे हैं रोशन वो इक
नूरे जलाली है॥1॥
न मादर खाला औ’ हमशीर न दुलहन दुखतरो माशूक। जिस्महै इक जो
इनसानी ये सब दिल की दलाली है॥2॥
खुदा गर तुम नही होते तो क्यों होती खुदी
पैदा। खुदी मैं है जो खुदमस्ती खुदा की ये निशानी है॥3॥
खुदाई का ये जल्व ऐ
नूर मेहबूब मानिक औ बंदा। फनाकर खुद को अल्लाह मे तू वाहद जात बारी है॥4॥
पद
वो लाशरीक अल्ला हर दिल जगा रहा है। माशूक इश्क आशिक जल्वा दिखा रहा
है॥ध्रु.॥
क्या खूब है बहाना दुनिया में मर्दो जनका। इश्के मजा खुदीका
अल्लाह (खुद ही) लुटा रहा है॥1॥
मंदिर में बिरहमन मसजिद में अहले इस्लाम।
नाजो अदा से अपने माशूक बना हुआ है॥2॥
आशिक हुआ जो मजनू लैला मे खुद फना। तू
हो फना खुदा मे देखो तो क्या मजा है॥3॥
ऐ बंदे शाह अहमद मानीक चिराग दुनिया।
रोशन है कुफरो इस्लाम अल्लाह से क्या जुदा है॥4॥
श्री माणिकप्रभु महामंत्र (आर्या)
श्री प्रभुकृपा विनोदें, होईल जगबद्ध मुक्त नित्य पहा।
जाळिल भ्रम प्रमासह, छेदुनि भव विधिनिशेध पादप हा॥1॥
मा मा गा अन्य कथा, पुनरागमनार्थ शुष्क हे श्रम कां।
सकल मतां प्रभु हा तारि, स्वाश्रमस्तुति निंद्य अन्य आश्रम कां॥18॥
णी स्वरूप (ण:) इ माया, म: शंभु हा अकार विष्णु पहा।
क ब्रह्मदेव ऐसा सर्वात्मक एक पूर्ण माणिक हा॥19॥
कल्पवृक्ष हा दृश्या, साधक सर्वार्थ वृत्ति भासवितो।
तन्नाम ग्रहण करी जो, त्यासि सुखें निर्विकल्पिं नांदवितो॥20॥
मनन करी स्तोत्रा जो, श्रद्धेनें त्या मिळेल गुप्त पथ।
अनृत वदो तरी, हो कां निर्दय तो प्रभु आह्मास ही शपथ॥21॥
ज्ञानरूप मार्तंड स्फूर्ति ही निज सुखांत अवतरली।
निश्चित जनक पाहुनि सद्भक्तातें स्वयंवरें वरिली॥22॥
मुक्तानंद लहरी
जगीं पाहे नामाकृति पुरुष अती सुंदर स्त्रिया।
सुवेशीं आभरणें नटति परि तें चित्रचि तया।
स्वयें साक्षी क्रीडा करित असता आणि रमता।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥1॥
कधीं देवालयीं हो कधिं घरिंच माडीवरीं बसे।
कधीं शैलाग्रीं हा कधिं क्वचित खेळे नदितटीं।
कधीं संतोषाने वसत ॠषिच्या पर्णकुटकीं।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥2॥
वनीं वृक्षा पाहे दलफलभरें नम्र दिसती।
बहुच्छायापक्षीगण मधुर शब्दें सुखविती।
बसे रात्रीं दिवसा शयन करि भूमंचकिं सुखी।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥3॥
कधीं विद्वासांसी अति सुरस आनंद रसिकीं।
कदाचित् काव्यालंकृत मधुर वाणी सुखविती।
वदे तर्का युक्ती श्रुति बहु सुतर्कें च हटवी।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥4॥
कधीं दिव्य स्त्रीच्या मुखकमलिं ग्रासाप्रति स्वयें।
सुखें घाली घेईं स्वमुखिं मग ठेवी मुख मुखीं।
अभेदाद्वैताचा स्वरूप महिमा तो प्रगटवी।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥5॥
मौना मौन दिसे गुणींत गुणि हा पंडिति पंडीतसा।
दीना दीन दिसे सुखींत सुखि हा भोगींत भोगी दिसे।
मूर्खां मूर्ख असा स्त्रियां तरुणसा वक्त्यासि वक्ता दिसे।
तो हा धन्य जगीं सुखी त्रिभुवनीं जोऽवधूताऽवधूत॥6॥
श्लोक
गुरुदत्तात्रय, सव्यभागीं शिव हा श्रीचित्कला पार्वती।
वामांगीं प्रिय श्रीनिवासप्रभु हा, रुद्रप्रभू मारुति।
अज्ञानांध वितंड नाशक पहा, मल्लारिमार्तांड हा।
अंतीं विठ्ठल पांडुरंग भजनीं लाभें सुखें मोक्ष हा॥1॥