। बोधमार्तण्ड ।

भजन

श्रीमाणिक जय माणिक।
हर माणिक हरि माणिक।
चिन्माणिक सन्माणिक।
हर माणिक हरि माणिक।।


पद

आत्मा एकचि सर्वांतरी हो।
आम्हां कोण शैव वैष्णव हो।
आम्हीं सकलमतां वंदू हो।
(चाल) चेतनीं त्रिविध भेदाचा लेशही नाहीं।
हा स्वानुभव घेऊं आम्हीं बाई॥1॥

आत्मा मतधर्मीही (शैव भागवत) नाहीं।
या जडभूता मीपण नाहीं।
अवघा घातक भ्रम हा बाई।
(चाल) या कोशा सोडूं जसा कीटक सोडुनि जाई।
तरि खचितचि मुक्त आम्हीं बाई॥2॥

प्रिय (जन) हो जो तुमचा प्रिय आत्मा।
विठ्ठल शिव भगवति तो आत्मा।
आह्मां तोचि वंद्य जगदात्मा।
(चाल) महावाक्या शोधूं जेथे भेदमत नाहीं।
मग घेऊं आत्मसुख बाई॥3॥

फळल्या बहुपुण्याच्या गांठी।
शिणले वेदशास्त्र या साठी।
हें सुख नाहीं स्वर्गी वैकुठीं।
(चाल) चेतनीं दृश्य जड भेद हा वितळुनि जाई।
जग अवघे चिन्मय बाई॥4॥

जन हो हें जग आपणचि होऊं।
आपणां आपणचि गाऊं ध्याऊं।
निशिदिनिं हेंच गीत आम्हीं गाऊं।
(चाल) तमनाशक चिन्मार्तांड उगवला बाई।
या सौख्या अंतचि नाहीं॥


पद

किति सुख हे किती किति सुख हें।
हरिहरांचेही हितगुज हें॥ध्रु.॥

कपिल जनक जडभरत दिगंबर।
वामदेव शुक धन हें॥1॥

महावाक्य श्रवण मनन साधन।
स्वानुभव सार निज हें॥2॥

तूर्या उन्मनि सुलीन समाधी।
चरमवृत्ति भूषण हें॥3॥

सच्चित्सुख माणिक मार्ताण्डा।
पूर्ण गुरुकृपा फल हें॥4॥


पद

आता जाऊं चला आम्हीं पाहूं चला।
गुरुराज प्रगट प्रभुराज प्रगट अवधूत आला।
बोलुं चला आणि प्रार्थु चला।
हा निर्विकल्प सविकल्पीं आला॥ध्रु.॥

घेति पत्र पुष्प फल जल गंध मणि मोती।
आणि नटुनि म्हणति आता वाहूं चला।
शीघ्र चलाअति शीघ्र चला।
हा निर्विकल्प सवि कल्पीं आला॥1॥

कोणि हार तुरा मौक्तिक गजरा।
रत्नकटक मुगुट शिरिं घालूं चला।
मागूं चला धन पुत्र सुख।
हा निर्विकल्प सविकल्पीं आला॥2॥

कोणि मागे गुजमंत्र योग ध्यान ज्ञान तंत्र।
नको जन्म परतंत्र पदीं रमूं चला।
ज्ञानरूप मार्तांड प्रभू।
हा निर्विकल्प सविकल्पीं आला॥3॥


पद

अवधूता शरण रिघाल्यें।
देहींच ब्रह्मसुख फळलें।
किति विस्मय नवल हें झाले।
ब्रह्मासी ब्रह्मपण आले॥ध्रु.॥

आहे तें अस्ति ब्रह्म।
भासतें ते भाति ब्रह्म।
विषयीसुख तें प्रिय ब्रह्म।
हें अस्ति भाति प्रिय ब्रह्म।
नामरूप मिथ्या झालें॥1॥

वंध्यासुत लग्न वर्हाडी।
मृगजली भ्याली दिली बूडी।
स्वप्नीचा तो नावाडी।
महावाक्य बोधुनी काढी।
लटक्या मुखी सार्थक झालें॥2॥

माया ही अर्थिक नाहीं।
मार्ताण्डी मृगजल पाहीं।
मग बंध मोक्ष तो काई।
ब्रह्मचि ब्रह्मसुख घेई।
मौनाचें बोलणें सरलें॥3॥


पद

नित्य वंदू त्या माणिकपायां।
प्रणवरूपें भासे ही जेथे माया॥ध्रु.॥

पूर्णकृपें कृपा बोलवेना।
अनुभवें अनुभवही साहीना।
बोधें बोद जाहली कल्पना।
मृत्यु पावली स्फूर्ती वासना॥1॥

अहंब्रह्मास्मि वृत्ती गळाली।
ऐक्यतेची समाधि हरपली।
शून्यविद्येची वार्ता निमाली।
कवणा सांगू हे गति कैंसी झाली॥2॥

ज्ञानमार्ताण्डोदय झाला।
भास विवर्त विरोनी गेला।
सहज माणिक होऊंनि ठेला।
हा ही अर्थ समूळ वाया गेला॥3॥


पद

आम्ही चुकलो निजहित कामा।
तूं चुकूं नको आत्मारामा॥ध्रु.॥

निजप्रकाशें अखण्ड जळसी।
मीपणें स्वतेजें स्फुरसी।
किति भूतगोल हें सृजसी।
या जीवा जागृति देशी।
हा आत्मशक्तिचा महिमा॥1॥

विषयांवर धावें वृत्ती।
जरि स्फुरे आत्मचित्स्फूर्ती।
होतसे भोग संपूर्ती।
वर्णिती वेद तव कीर्ती।
तूं भोक्ता जगिं जगदात्मा॥2॥

जागृती भोग हा क्रमिला।
कल्पित प्रपंची रमला।
बहुरूपे एकचि नटला।
नोळखे आत्मशक्तीला।
भोगत्रयि एक चिदात्मा॥3॥

कोण मी नकळे अज्ञानी।
शरणागत विद्वच्चरणी।
बोधामृत पडलें श्रवणीं।
मी धन्य मी ब्रह्मज्ञानी।
बहुरंगी हा सर्वात्मा॥4॥

श्रीसकलमतप्रभु आले।
स्मितहास्यें वच हें वदले।
कोण बद्ध मुक्त जगिं झाले।
नसतेचि नाहिंसें झाले।
नित्यमुक्त सहजसुख सीमा॥5॥

मंगलादि मंगल शक्ती।
मंगल मुख मानस वृत्ती।
मंगल शिव मायिक स्फूर्ती।
मंगल हो सहज स्थिति मुक्ती।
मंगलरूपीं मंगलधामा॥6॥

आळवी तूं चेतन देवा।
हांक देई धावा धावा।
द्या सहजमुक्तिचा ठेवा।
जरि जन्मांतरि घ्या सेवा।
पूर्णादि पूर्ण परमात्मा॥7॥

मार्ताण्डप्रभें तम हरलें।
धुंडिता जीव भ्रम न मिळे।
ब्रह्मगान श्रवणीं रुचलें।
ज्ञानाब्धि सहजचि उसळे।
सच्चित्सुख जगदभिरामा॥8॥


पद

हा शैव नव्हें मनुजाधम मूढ तो ऐका।
मी सांब नव्हें कोण मी धरी जो शंका॥ध्रु.॥

ब्रह्मादिस्तंब जड शक्ति हीच शाळुंका।
चैतन्यलिंग शिव अलिप्त माया पंका॥
अवकाशरूपिणी कामेश्वरी वामांका।
हा वृत्तिप्रवाह गंगाजल भवनौका॥
दृग् विषय भोगवी चेतन मी सांब।
अंतरी प्रकृति गुण साक्षी मी सांब।
जगि सुषुप्ति लय सुखदातामी सांब।
मत्सन्निधान सत्ता ही विद्या क्षणिका।
मज अनंतवेषे सुखवि कुशल जशी गणिका॥1॥

हे पंचभूत मी पंचमुखी शिवराणा।
मनप्रवाह चेतवी परि न धरी अभिमाना॥
कधि दु:ख भोगि कधि विनोद करि शिवगाना।
मनशिशु खेळ खेळोनि येई शिवसदन आत्मनिजसदना॥
ईशान रुद्र मृड अष्टमूर्ति मी सांब।
भ्रम भस्म चर्चि शिवदीक्षा मी सांब।
स्त्री पुरुष सर्व हें जगदंबा आणि सांब॥
कैलास देह मी जगदात्मा मग भय कां?
भूलिंग ज्ञानमार्ताण्ड सत्य शिव डंका॥2॥


पद

मायामलधूत आम्ही अवधूत।
दृश्य पंचभूत जाणूं आम्ही॥ध्रु.॥

जाणूं आम्हीं स्वप्न सुषुप्ति जागृती।
जन्म-मरण-भीति नाहीं आम्हां॥1॥

नाहीं आम्हां देह वासना संबंध।
कैंचा मोक्षबंध चिदाकाशी॥2॥

चिदाकाशी चित्र निर्गुण सगुण।
आम्हीं ब्रह्म पूर्ण सत्य ज्ञान॥3॥

ज्ञानमार्ताण्ड हा बोध अभंग।
झाला भवभंग हरपली माया॥4॥


पद

श्रुतिधर्म रक्षुनि सकलमताते वंदा।
सर्वांतरि आत्मा नको कुणाची निंदा॥ध्रु.॥

नाटकी जसा बहु वेष नटुनि करी छंदा।
जगदीश ही नटतो निजप्रिय ध्यानानंदा।
जगदीश ही नटतो भक्तांच्या आनंदा।
॥चाल॥ किति तीर्थ अमंगल सरिता सागरी।
मिसळती शब्द बहु भाषा वैखरी।
जग ब्रह्म ब्रह्म जग वेषा हो धरी।
मृगजली रूप मार्ताण्ड रूपांतरी।
अद्वैत बोधु आम्ही हाचि हो अमुचा धंदा।
हे सत्यासत्य तूं जाणसी हरि गोविंदा॥1॥


पद

ये ग ये श्रीगुरु ब्रह्मस्फुरणे।
चिन्मणि घनकिरणे।
माये अज अनंत ज्ञानाभरणे।
शतमुख शतचरणे।
अनादि सादि सृष्टि दृष्टि भ्रम
बंध मोक्ष श्रुतिवाक्यालंकरणे॥1॥

आद्ये अससी निज निर्गुण
धामी सर्वांतर्यामी।
तूर्ये श्रमलीस या अद्भुत
कर्मी वैरधर्म नियमी।
सर्वांतरीं नटसी त्रिपुटी चिद्-
भ्रमाधार मानमेय करणें॥2॥

विश्वे बीजमहद्भूताकाशे
शिव जीवाभासे।
विद्ये अमित ग्रंथि सूक्ष्मविकासे
धीवृत्ति विलासे।
भेदशुद्ध सांख्ययोग मिथ्या
सकल स्वमतवाक्यालंकरणें॥3॥

अमृते अस्ति भाति प्रिय जंजाले
सत्ताऽलवाले।
सुकृते सुख उन्मनि समाधि-
मूले सच्चित्सुख लीले।
ब्रह्म उखर मृगजल मार्तांडे।
व्यंके जय निर्विकल्पपूर्णे॥4॥।।


पद

कमलवदनीं हें अमृत भरा।
माणिक माणिक मंत्र स्मरा॥ध्रु.॥

द्वैतबुद्धि ही दूर करा।
अहंब्रह्म हे नच विसरा॥1॥

सकलमताचा पंथ धरा।
सर्व सौख्य येईल घरा॥2॥

महावाक्य हे मनीं विवरा।
ज्ञानरूप मार्तण्ड स्मरा॥3॥


पद

कोण्या सुकृत दैव हें फळले।
गुरुहस्तामृत शिरीं पडलें।
मन माझे वळलें।
स्वहितगुज कळलें॥ध्रु.॥

किति भ्रम हें अहा किति भ्रम हें।
कोण बद्ध कोण जगिं सुटलें।
भूतगुण नटलें।
व्यर्थ जन शिणलें॥1॥

किति गुज हें अहा किति गुज हें।
बहुशास्त्र वेदही थकलें।
अनुभवी थिजलें।
मौनपणीं रमलें॥2॥

किति सुख हें अहा किति सुख हें।
हें पंचभूत नाहीं सरले।
देखणें फिरलें।
स्वरूपचि भरलें॥3॥

(चाल) किति धन्य भाग्य विश्वाचें।
स्वस्वरूपीं स्थिर परि नाचे।
अज्ञानि जीव नरकाचे।
सज्ञानि जीव मोक्षाचे।
हें कपट मूलतत्त्वाचे।
आमुचें न तुमचें।
जो मानील त्याचें॥

तुज नमो बोध मार्ताण्डा।
तूं शमवि वाद पाखाण्डा।
निजरूपी ठेवि ब्रह्माण्डा।
नाचवी सुखाचा झेण्डा।
हें काव्य बोलणें सरलें।
संभ्रम पुरलें।
मीपण नुरलें॥4॥


पद

किति जनासी भ्रम हा झाला।
मी ब्रह्म न कळे जीवाला॥ध्रु.॥

जे सच्चिदानंद म्हणती।
ते अस्ति भाति आणि प्रीति।
जन विषय हेचि अनुभविती।
कल्पिती नामरूपाला॥1॥

सर्वांतरी एकचि साक्षी।
जो बंध मोक्ष अनुलक्षी।
जो मूलाज्ञाना भक्षी।
सिद्धांत पूर्वपक्षी।
कोण लपवील मार्ताण्डाला॥2॥


पद

गजवदन चित्प्रभू लीला।
विजयप्रद हो या बालां।
प्रभु भूपालाआणि विश्वाला॥ध्रु.॥

वाग्रत्नालंकृत माला।
जगपोषक या श्री प्रभुला।
नमुनि पदकमलां कण्ठी घाला॥1॥

मग नमूं स्फूर्ति चिद्बिंबा।
व्यंकंमा जयतु जगदम्बा।
जननि हेरम्बाजी निरालम्बा॥2॥

शारदा मंगलारंभा।
बिंबाधर पृथुल नितम्बा।
हेमकुचकुंभाविधृत स्वर तुम्बा॥3॥

तो दत्त ती प्रभु सत्ता।
गणपती सरस्वति माता।
मार्ताण्ड प्रभा सम समता।
सुख स्वात्मानंदी डुलता।
नाचती तकता थैत्ततत
गिण झुण झुण तत किट किट धेत्ता॥4॥


पद

ऐका तुम्हीं संत अनाथाच्या बोला।
तुम्हीं अवतरला जगकल्याणा॥1॥

ऐकणें पाहणें बोलणें चालणें।
उपजणें मरणें चेतनशक्ति॥2॥

योग भक्ति ज्ञान प्रेम आलिंगन।
सिद्धि ओळंगणें शक्ति चेतनाची॥3॥

शरीरा चेतवी भक्तिभाव दावी।
अनंत लाघवी चेतन आत्मा॥4॥

देवा विसरावें नाशिवंत ध्यावें।
जनीं मिरवावें जाणीव आपुली॥5॥

नथ दिल्या वंदा नाक दिल्या निंदा।
अज्ञानाचा धंदा सोडवी देवा॥6॥

अन्य मतीं द्वेष वरी भजन घोष।
सर्वांतरी ईश वेद मुखि ज्ञापी॥7॥

सकलमती व्हावें सर्वांशी वंदावें।
आत्मा ओळखावे क्षणोक्षणीं॥8॥

ज्ञानमार्ताण्ड हा सर्वां मनीं स्फुरला।
धन्य तो पावला सहज मुक्ति॥9॥


पद

संत (भक्त) शिरोमणि खरा परंतु
तें नाहीं बा तें नाहीं॥ध्रु.॥

देवता सिद्धि साधणें।
जग मायिक हें जाणणें।
अवघें ब्रह्मरूप अनुभवणें।
जोवरी हें बोलणें तोवरी।
तें नाहीं बा तें नाहीं॥1॥

नवविधा भक्ति स्थापिती।
एकनिष्ठ देह झिजविती।
नाचती उडती डोलती।
सत्यलोक (स्वर्गलोक) वैकुण्ठ (कैलास) मिळें परि
ते नाहीं बा तें नाहीं॥2॥

देह हा पंढरपुर शोधिला।
विठ्ठल रखुमाई चित्कला।
स्नान (नाहणें) प्रेम (ज्ञान) चंद्रभागेला।
अशी यात्रा न घडे वैष्णव परि।
तें नाहीं बा तें नाहीं॥3॥

भजा आत्मा चिन्मार्ताण्डा।
लाविला मुक्त पदीं झेण्डा।
सोडा अनंत मत पाखांडा।
सकलमती शिव तुम्हां नको जरि।
तें नाहीं बा तें नाहीं॥4॥


पद

गुज बोलवेना बाई।
सुख सांगवेना बाई।
स्फूर्ति आवरेना।
एकोऽहमात्मा गुज बोलवेना॥ध्रु.॥

नको उपदेश नाना।
भागत्याग लक्षण जाणा।
ब्रह्मचि भेटे ब्रह्मा।
स्फूर्ति आवरेना।
एकोऽहमात्मा गुज बोलवेना॥1॥

अहमन्नमन्नाद:।
वेद बोले भेद निंदा।
कुणी आम्हां वंदा निंदा।
स्फूर्ति आवरेना।
एकोऽहमात्मा गुज बोलवेना॥2॥

आत्म प्रकाश अखण्ड।
मृगजल माया बंड सदानंद चिन्मार्ताण्ड।
स्फूर्ति आवरेना।
एकोऽहमात्मा गुज बोलवेना॥3॥


पद

येई येई ग चित्कमले चिन्मधु उन्मनि बाले।
चेतन वामांके चित्पंके व्यंके करुणालवाले॥ध्रु.॥

विश्वा ईशचि ग जरि बुडवी।
माता वत्सा वधवी।
भक्ता देवचि ग जरि भुलवी।
शिष्या श्रीगुरु भ्रमवी।
तैसी कोपसि तूं तरि कोणा
करुणा वाणी वदावी।
आम्हां हतदैवा मग कैंची
गुरुसेवा सुख पदवी॥1॥

वातें बल धूलीसी दावियलें।
काळें कीटक वधिले।
शिवनेत्रे त्रणपर्णा जाळियलें।
चक्रे मशक वधिले।
तैसें तूं जननी निजसत्ते
दीनजना मोहविले।
काय पराक्रम तूझे आणि आम्हा
माता नाम हें फळले॥2॥

मधुकर देह त्यजी मधूपानी।
कुरंग सुस्वर गानी।
पतंग दीपा ग तनु अर्पी।
स्वरूपीं जैंसा ज्ञानी।
चरणीं मस्तक हें अर्पियलें
घे भूषण हें मानी।
चिन्मणि मार्ताण्डे मधुखण्डे
निर्विकल्प पद दानीं॥3॥।।


पद

व्यंका नाम जगज्जननी
कुलभूषण ही अवतरली हो।
शंका भ्रम चण्ड मुण्ड मर्दिनी
रंकाऽमरपद देई हो॥ध्रु.॥

अति भट कटक विषय दुर्घट हठ
शमवाया ही नटली हो।
टंकारुनि हटयोग चाप गुण
दृश्य स्फूर्ति सह वधिली हो॥1॥

पद्मासनीं शुभ शांत मुद्रा
शुभ्रांबर कटि कसली हो।
परम प्रिय गुरुभक्तां सुखकर
वर देण्यां ही सजली हो॥2॥

सत्यज्ञानानंदरूप चिन्
मार्ताण्डाची लहरी हो।
निर्विकल्प स्वस्वरूप हितगुज
श्रीमाणिकपदीं मुरलीं हो॥3॥।।


पद

ब्रह्म मूल जग ब्रह्म ब्रह्म
जग अहंब्रह्म मतवाला है।
ब्रह्मभास माया विद्या सब
ब्रह्मवृक्ष फलफूला है॥ध्रु.॥

अनादि अनंत जीवातम का
भेदबाद भ्रमजाला है।
ज्ञानस्फुरण अज्ञान तर्क मत
चेतन का उजियाला है॥1॥

चार मुक्ति महावाक्य बोधसुख
शब्द मौन गुरु चेला है।
अपनी माया जान मिटाई
तब गुरु आप अकेला है॥2॥

चिन्माणिक मार्ताण्ड शिष्य गुरु
अभेद हरि शिवभोला है।
बडो भाग्य वैकुंठधामसुख
आज सकलमत मेला है॥3॥


पद

येई चेतन सांबा मन हें आवरी।
हृदयाकाशी उठती मी मी लहरी।
नकळे कोण मी भ्यालो मज पोटिं धरी।
बुडतो भ्रमजल डोहीं न्या पैलतिरी॥ध्रु.॥

नाहींसी तरि ही सृष्टि कवणें रचिली।
‘अहं ब्रह्म’ ही वृत्ति कवणा स्फुरली।
अनंत जडजीवाकृति कशि हो दिसली।
प्रकाशावांचुनि निशि ही कुणि भासविली॥1॥

माझें मीपण सांबा त्वां चेवविले।
जागृति स्वप्न सुषुप्ति त्वां भोगविलें।
‘अंतर्यामी’ म्हणुनी वेदीं स्तविलें।
अंतरि वसुनी सांबा मज अंतरिले॥2॥

विषयभोगपर वृत्ति जेंव्हां मुरली।
अन्य वृत्तिही नाहीं शांती फळली।
प्रगटे चिन्मूर्ति जी हृदयीं वसली।
हा अनुभव सर्वां परि मति हो भ्रमली॥3॥

स्त्री पुरुषाकृति तूझी जाणुनी भुलतो।
विषयी सुख तूं नाथा नेणुनीं रमतो।
न कळे कोण मी ऐंसे कळुनी भ्रमतो।
नाथा आत्मस्मृति दे चरणीं नमितो॥4॥

पूर्णकाम तू सांबा जग कां रचिलें।
‘ममैवांश’ म्हणता परि नरकें पिडिलें।
दुर्घट मायावाक्य हें आम्हां फळलें।
त्राहि त्राहि हे भगवन् दैवें त्यजिले॥5॥

पर शिववाणी वदली वत्सा उठि हो।
आत्मोल्हासी जग हें मग कां भय हो।
जीव भ्रम तूं साक्षी शिव हो शिव हो।
तव भूषण ही माया तुज मंगल शुभ हो॥6॥

मी आहें या अनुभवी सत्ता प्रगटे।
अनंत जन्म ज्ञान विण चेतन न घटे।
स्वप्नी ही निद्रासुख न कदापि विटे।
चिदानंद मी निश्चयें हें दैन्य फिटे॥7॥

स्वानुभव स्फूर्ति पद मनीं सार्थ जडे।
ब्रह्म कपाट अविद्या सहजी उघडे।
चिन्मार्ताण्ड प्रसादें हा योग घडे।
सकलमतप्रभु नांदे जिकडे तिकडे॥8॥


पद

मीपण गेल्या हा देह जावो वा चिर राहो।
विकल्प गेल्या मग द्वैत पाहो अद्वैत होवो॥ध्रु.॥

देहाभिमान गेल्या शैव नाहीं वैष्णव नाहीं।
नि:संग ब्रह्मासी नाम नाहीं वा रूप नाहीं॥1॥

फलचि नाहीं तेथे कर्म नाहीं मूलधर्म नाहीं।
झालाचि नाहीं त्यां जन्म नाहीं वा मृत्यु नाहीं ॥2॥

द्रष्टाचि नाहीं तेथें दृश्य नाहीं वा ज्ञान नाहीं।
भ्रांतिही गेल्या कोणि बद्ध नाहीं वा मुक्त नाहीं॥3॥

अनुभवी या संन्यास नाहीं वा भोग नाहीं।
लटक्या व्यवहारीं निषेध नाही वा विधि नाहीं॥4॥

स्फूर्तिच नाहीं तेथे वेद नाहीं वा शास्त्र नाहीं।
दुर्वाद घेतां अनुभव नाहीं वा सौख्य नाहीं॥5॥

मुळींच नाहीं त्या नाम नाहीं वा रूप नाहीं।
ज्ञानमार्ताण्डा उदय नाहीं वा अस्त नाहीं॥6॥


पद

गुरुवचना कानीं घेऊं।
या जगीं अखण्ड (आम्हीं तुम्हीं) मुक्तचि राहू॥ध्रु.॥

शरीर हें पंचभूतांचे बनले।
काल स्वभावें कर्मे रचिले।
स्वस्वरूपी मायिक हें नटले।
साक्षीपणें आम्हीं पाहूं॥1॥

जग हा पंचभूतांचा साठा।
कोण शैव वैष्णव हा ताठा।
क्षणिक अहंवृत्तीच्या लाटा।
निश्चलात्मक रूप गाऊं॥2॥

नको दृश्य जग नाश वासना।
समाधि उन्मनि स्थिति ही नाना।
स्वरूपी भव संबंध कल्पना।
सहज स्थिती सुख सेवूं॥3॥

बोध ज्ञानमार्ताण्ड उगवला।
अभेद मति दे जड जीवाला।
जय हो जो प्रभु सकलमताला।
चिन्माणिक आम्हीं होऊं॥4॥


पद

सूरत खूब अजब दरसायो।
राजा चेतन हर घट अपनी॥ध्रु.॥

सताकास चित्प्रकास प्रिय नित
आतम ज्ञान ज्योती।
कुदरत से तन महल बनाकर
घट घट आँख (नेत्र) बसायो॥1॥

ज्ञानी बन मुगति पद पधारे
अज्ञानी बन षंढा।
खेल खेल पट खोल खड़ा तब
नहीं मूरख नहीं पण्डा॥2॥

एकहि प्रेम प्रभाव नचावत
नाचे मरद लुगाई।
नाता गोता करम धरम सुध।
मूरख मन समझाई॥3॥

सुख कारन तुम सृष्टि मचाई
भूल परत संसारा।
वेद भाट तुमही को रिझाने
महावाक्य ललकारा॥4॥

आपहि अनंत मतधारी बन
भटकत अजब तमासा।
दीनदु:खहर श्रीप्रभु आपहि
चिन्मार्ताण्ड प्रकासा॥4॥


पद

ब्रह्म रे जीवा ब्रह्म रे।
तूंचि ब्रह्म म्हणुनि बोलती श्रुति रे॥ध्रु.॥

शब्द ज्ञान हे नेत्रासि नाहीं।
रूप जाणणें श्रोत्रासि नाहीं।
शब्द रूप यांसि साक्षित्व नाहीं।
तूंचि साक्षी अन्य साक्षी तो नाहीं॥1॥

स्वप्न भोग हा जागृति नाहीं।
जागृति सुख दु:ख स्वप्निंही नाहीं।
जागृति स्वप्न सुषुप्तीत पाही।
तूंचि साक्षी अन्य साक्षी तो नाहीं॥2॥

नाद धर्म तो बिंदूसि नाहीं।
बिंदु धर्म ते नादासि नाहीं।
बिंदु कला नादीं जाणणें नाहीं।
तूंचि साक्षी अन्य साक्षी तो नाहीं॥3॥

देव निजात्मा भक्त तो पाही।
भक्तात्मा हा देवचि पाही।
देवाभक्ता मुळीं भेद तो नाहीं।
चिन्माणिक हा मार्ताण्ड पाहीं।
तूंचि साक्षी अन्य साक्षी तो नाहीं॥4॥


पद

नमो घोरतर कालाग्निरुद्ररूपा।
कोटि विद्युज्ज्वलद्वीरभूपा॥ध्रु.॥

रक्ताक्षि कटकटोल्हासकृत दंतरव।
पुच्छकृत फटफटोड्डाण शूरा।
भूत वेतालगण पाद नख सेविता।
सौमित्रजीवनाधार धीरा॥1॥

विश्वबल दैत्य सुर दानवां प्राण तूं।
मंत्रफलदानैकबद्ध दीक्षा।
वज्रांग वज्रनख काल कालांतका।
अपमृत्यु दैन्य रोगारि भक्षा॥2॥

एकमुख पंच एकादशानन हरे।
त्राहि मां पाहि अति संकटत्राता।
माणिकक्षेत्राभिमानरक्षणदक्ष।
पूर्ण चिन्मार्ताण्ड कामफलदाता॥3॥


पद

हा दिसे स्फुरे जो आनंद।
हा विषयी स्फुरे जो आनंद।
न्याहाळिता तोचि ब्रह्मानंद।
शोधिता पूर्ण ब्रह्मानंद॥ध्रु.॥

आत्मतेजा वृत्तितेजा।
विषयप्रकाशा भेदचि नाहीं।
चित्सिंधु विषयाकृति उसळे।
स्वात्मशक्तिचा हा छंद॥1॥

आत्मभावा सृष्टिभावा।
त्रिपुटीभावा मूळ तो आत्मा।
आत्मज्योति नामरूप दावी।
चिद्विलास सहजानंद॥2॥

चिन्मार्तांण्ड किरणीं बहुरंग हे।
नाटकी चित्र नटे हा आत्मा।
एक पूर्ण जवळीच प्रभु हा।
सहजमुक्त सहजानंद॥3॥


पद

कधि पाहीन मी माझ्या स्वस्वरूपाला।
आनंदपूर्ण ब्रह्माला।
कधि बोधिल हा भवमोचक गुरु मजला।
ऐकेन मी महावाक्याला॥ध्रु.॥

आज दिपवाळी जन्मदिवस उगवला।
भेटला कीं श्रीगुरु मजला।
बहुजन्माचा भाग्योदय हा झाला।
जीव ब्रह्मरूप शिव झाला।
॥चाल॥ किती वर्णू मी सुख हे अहाहा।
संगीत साम हा ऊ हा।
धन्य धन्य बोधक गुरु हा।
मिठी घालीन मी परशिव घनरूपाला।
ज्ञानरूप मार्ताण्डाला॥1॥


पद

झालों आम्ही बहु धन्यरे।
भेटलें सगुण हें ब्रह्म रे॥ध्रु.॥

नको उदास स्थिति ती मुक्ती।
ही माया आम्हां प्रिय भक्ती॥1॥

महावाक्य नको हें आम्हां।
घेऊं तुझ्या सुमंगल नामा॥2॥

नको वियोग तूझा देवा।
जन्मजन्मीं घे तुझी सेवा॥3॥

तू जीवन या ब्रह्मांडा।
तूं प्रकाश चिर्न्मांडा॥4॥


पद

धन्य धन्य अति धन्य धन्य आम्हीं झालो पूर्णानंद।
बंध मोक्ष भ्रम कोण तो जाणे अवघा ब्रह्मानंद॥ध्रु.॥

जागृति विषयी सुख जें होते तोचि विषयानंद।
स्वप्नी अनेक रूपे नटतो तोचि वासनानंद।
घनीभूत वृत्ति जी सुषुप्ति तोचि योगानंद।
मायिक भोग अवस्था पाहतां एकचि निज आनंद॥1॥

महावाक्य बोधे अनुभव जो तोच विद्यानंद।
समाधि सुख निर्विकल्प योगी तोचि सहजानंद।
वृत्तिस्फूर्तिविरहित जे उरलें तोचि स्वरूपानंद।
भूत भेद भ्रम मायिक पाहतां घन अद्वैतानंद॥2॥

अनेक क्षण मन उपाधि भेदे अनेक सुख गमलें।
शांत रज तम वृत्ति निविृत्ति एकचि सुख भरलें।
ज्ञानरूप मार्ताण्ड उगवतां संशय तम हरलें।
चिन्माणिक आम्हीं सर्वहि झालो आनंदी आनंद॥3॥


पद

हंस: सोऽहं सोऽहं हंस:।
अजपाजप सद्ब्रह्म प्रकासा।
ध्यात जपत जो अजपामाला।
सहज खेल जग स्थिति लय लीला।
सिद्ध मंत्र बल ज्योति प्रचंडा।
दे उपदेस ज्ञानमार्तांडा॥1॥

अस्त समय शिव नाचत प्यारा।
शांभवगण शिव हर ललकारा।
अखिलकोटि दीपक ब्रह्मांडा।
ज्योतिरूप शिव चिन्मार्तांडा।
निजानंद ईशभूति दायक।
अभेद शिव माणिक जय माणिक॥2॥

माणिक माणिक जय गुरु माणिक।
माणिक माणिक शिव हर माणिक॥


पद

श्रीगुरु माणिक जय गुरु माणिक।
हाचि गुरुउपदेश मुख्य आम्हां।
दान व्रत यज्ञ हे स्नान गंगा।
सोमपान मधुअमृतरस सेवुं नामा॥ध्रु.॥

पुण्य जय सत्कीर्ति दक्षिणोत्तर मार्ग।
हेचि अमनस्क हट तारकादि।
ज्ञान हें ध्यान हें महावाक्य भजन हे।
भक्तकल्पद्रुमा सार्वभौमा॥1॥

क्षेत्र माणिक मंत्र तीर्थ संगम वास।
भिक्षान्न अवधूत भजन द्या देवा।
बोध मार्तण्ड हा विश्वहृदयीं वसो।
जन्मोजन्मीं हेंचि दान द्या देवा॥2॥


पद

अरे जा श्रीप्रभु रिझवा।
हे वय जाते अहा हा हा॥ध्रु.॥

अहा तारुण्य मद धन हे कुणा हो शेवटा नेले।
क्षणिक हो रंग हा हिरवा।
हे वय जाते अहा हा हा॥1॥

अहाहा या विषयभोगा किती हो दीन तुम्ही झालां।
हे जन हो, स्वानुभव आठवा।
हे वय जाते अहा हा हा॥2॥

स्वकर्में चालते जग हे प्रिय स्त्री मित्र सुत बंधु।
अशा बोधे मना फिरवा।
हे वय जाते अहा हा हा॥3॥

पहा हो कल्पजीवी शूर कवि राजे कुठें गेले।
मी मोठा दंभ हा हटवा।
हे वय जाते अहा हा हा॥4॥

महायोगी तपस्वी हे कसे एकांत सुखवासी।
तसा एकांत सुख सेवा।
हे वय जाते अहा हा हा॥5॥

शरण जा बोध चिन्मार्तांड।
रूपा पूर्ण तुम्ही जाणा।
निजानंदा मनीं ठसवा।
हे वय जाते अहा हा हा॥6॥


पद

विसरूं जरि या चरणा हे प्रभो
तरि द्यावें मरणा हे प्रभो।
देह पडो दुर्मरणचि येवो
न करूं तव स्मरणा हे प्रभो॥ध्रु.॥

शतमख जरि केलों विधिने
वेद स्तविजेलों विधिनें।
धीश सुरेश महेशहि झालों
परि पावो पतना।
हे प्रभो जरि न करूं नमना हे प्रभो॥1॥

परसिद्ध्या वळल्या आपणचि
गुरुपद मज आलें आपणचि।
योग जळो आणि ज्ञान जळो तें
जी न करी भजना।
हे प्रभो झडू दे ती रसना हे प्रभो ॥2॥

रौरव नरक घडो या देहींच
मुखिं बहु कृमी पडो या देहींच।
निंदा जरि करूं निजगुरुस्थाना
आणि डोलवूं माना।
हे प्रभो नरककूप कानां भो हरि॥3॥

टाकुनि गुरुमंत्रा कुमतिनें
पूजूं सुरयंत्रा सुमतिनें।
माणिक माणिक हा जप सोडुनि
आणिक धरूं ध्याना।
हे प्रभो न्यावेयमसदना हे प्रभो॥4॥

सेवक हा तुमचा हो प्रिय
बोला मुखें ‘आमुचा हो प्रिय।
ज्ञानरूप मार्तांडस्वरूपीं
अभेदमति जडूं द्या।
हे प्रभो सेवा ही घडू द्या हे प्रभो॥5॥


पद

माणिका येई माणिका येई।
प्रियनामा सच्चिदानंद धामा॥ध्रु.॥

आत्मा स्वच्छंदे नाचविसी।
जग मायिक भासविसी।
करुनी कर्मातें उपनिषदें।
अलिप्त तूं बोलविसी।
स्फूर्णवाणीतें प्रेरविसी।
अनिर्वाच्य तूं अससी॥1॥

तत्पद ईश्वर तूं क्रीडाया।
एकचि बहुधा होसी।
आपणां विलोकुनी अति हर्षे।
सर्वही आपणचि होसी।
प्रवेश करूनियां निजसत्तें।
दृश्य जडां चेतविसी।
नामरूपाते दावुनियां।
स्वस्वरूप लोपविसी॥2॥

विनोद तूझा हा बहुरूपें।
भक्तिबळें अवतरसी।
देउनि पदसेवा निजसदनीं।
आनंदें नांदविसी।
ज्ञानमार्तांडा द्योतविसी।
निर्विकार सुखराशी॥3॥


पद

अवधूत भजा अवधूत।
ब्रह्म होती हे भूत सहज।
अवधूत भजा अवधूत।
मायामल निर्धूत सहज।
अवधूत भजा अवधूत॥ध्रु.॥

निरालंबी आलंबन करि जो।
तोचि शुद्ध अति पूत॥1॥

परमहंस सनकादिक वंदिती।
जगभरित महद्भूत॥2॥

भक्तकार्य कल्पद्रुमगुरु हा।
विधि हरि हर पदीं विनत॥3॥

प्रिय मार्ताण्डाकार एक सुख।
चिन्मय ओतप्रोत॥4॥


पद

कुणि आणा हो भक्तसखा (दीनप्रभू) तो आणा।
चैतन्य देशिंचा (आनंद देशिंचा) राणा॥ध्रु.॥

जन भुलला हो निज मायेनें भुलला।
महाविषय मृगजळीं बुडला।
या पंचभूतां सत्य कल्पुनी रमला।
बहु जन्म जन्मुनी गेला॥1॥

मोहशक्तीनें (मोह वैर्यानें) जीवा घातचि केला।
प्रिय (जन) स्वस्वरूपां हो मुकला।
जग (जन) उपकारा जाउनि त्या श्रीचरणां।
या भवदु:खा वाखाणा॥।

(चाल) कोणि विश्वां हितगुज सांगा।
मी देह (जीव) बुद्धि ही त्यागा।
जा सच्चिदानन्द पदीं लागा।
ज्ञानमार्ताण्डा दिव्यदृष्टिनें (आत्मदृष्टिनें) जाणा।
जग ब्रह्म हेंचि मनिं आणा॥2॥


पद

आतां जाई रे शरण
जरि धरिसि चरण
दूर जन्ममरण
करी गुरुची कृपा।
टाकुनियां गुरु सार्वभौम हा
कां रे तूं पसरिसी कर हे नृपा॥ध्रु.॥

हा देह शकट
अस्थि मांस प्रकट
पहा सकल हे घट
जन्ममृत्यु जरा।
कालचक्रिं गुंतले जीवशिव
शिवशिवशिव कधि येतील घरा।
हे स्त्री पुत्र धन देह लोभांचे बंधन
येंणे पावसी पतन करि शीघ्र त्वरा।
ज्ञानामृत पिऊनी सुखी हो
कितितरि सेविसि विषय गरा।
बहु वाढविले तंत्र
किती जपसी हे मंत्र
परि होसी परतंत्र
धरि श्रीगुरुजपा॥
टाकुनियां गुरु सार्वभौम हा
कां रे तूं पसरिसी कर हे नृपा॥1॥

पहा स्थूल सूक्ष्म गति
गुण अवस्था जागृति
स्वप्न सुषुप्ति उत्पत्ति
स्थिति लय व्यवहार।
पंचभूत माया विद्या त्रै-
कालिक मिथ्या करि तूं विचार।
तूंचि पंच महापापी
वेदतयालगीं शापी
बोले जग द्वयरूपी
भेद करी व्यवहार।
ज्ञानरूप मार्तांड प्रकाशें
द्वैतदृष्टिचा करि संहार।
मुळी झालाचि नाहीं
मग कैची भव फांशी
गुरुवाक्य उजळिसी
या ज्ञानदीपा॥
टाकुनियां गुरु सार्वभौम हा
कां रे तूं पसरिसी कर हे नृपा॥2॥


पद

नमो पूर्ण सुखभरित चैतन्यधामा।
सच्चिदानंद गुरु सार्वभौमा॥ध्रु.॥

एक सद्वस्तु घन अविट अज निजरूप।
अनृतमय जगदखिल भावशून्य।
सिद्ध सिद्धांतपर सूक्ष्मतर निर्मला।
निष्कला स्वानुभव वेदमान्या॥1॥

पंचभूत त्रिगुणरहित गुणसाम्यसम।
विषम अति शांति गुज निर्विकारा।
योगिजन साम्राज्यपट अती मौनपद।
भूत भवदृश्य संसारसारा॥2॥

निश्चल निरालंब निर्विकल्पाकाश।
निगमनत नेति नेतीति शुद्धा।
नित्य नूतन निजानंद गुरु अवधूत।
निरतिशय ज्ञानमार्ताण्ड बोधा॥3॥


पद

जन चला चला गुज पाहण्या हो॥ध्रु.॥

पुनरपि जननमरण हे चुकवुनी।
स्वरूपीं निज सुख घेण्या हो॥1॥

श्रीगुरुनीं त्या जनक शुका जे।
लेवविलें प्रिय लेण्या हो॥2॥

ज्ञानरूप मार्तांड प्रभू।
श्रीमाणिक आपणचि होण्या हो॥3॥


पद

ऐका विनवणी तुम्हीं संतभूप।
भेदनामरूप एक तो आत्मा॥ध्रु.॥

रामकृष्ण संत सज्जन महंत।
भक्त भगवंत एकरूप॥1॥

भक्ताचिया धूळी भगवंत लोळे।
ऐक्याचे सोहाळे व्यास तो वदला॥2॥

बोध मार्ताण्ड हा आज उगवला।
भेदभाव गेला आत्मानंदी॥3॥


पद

हम असंग चेतन सांई।
ये दु:ख प्रवाह हम संग नाहीं॥धु.॥

हम आकाश नित जग को आधारा।
अचानक मेघ उठत जलधारा।
दिखत छुपत अंधियार उजाला।
हम न किए न मिटाई।
ये दु:ख प्रवाह हम संग नाहीं॥1॥

इह संसार खिलौना मन का।
मन कंजाल है चेतन जल का।
जल की न हानि न लाभ है तिनका।
जूं नट दीप नचाई।
ये दु:ख प्रवाह हम संग नाहीं॥2॥

जल चाहत नहीं तरंग फेसा।
घटत बढत जूं दिन दिन सांसां।
होत जात भूतन में तमासा।
हम न रिझे न रिझाई।
ये दु:ख प्रवाह हम संग नाही॥3॥

आद ब्रह्म गुरु मानिक हंसा।
सो गुरु चिन्मार्ताण्ड प्रकासा।
निराकार अरु दे उपदेसा।
ये चेतन चतुराई॥4॥


पद

हात जोर बिनती यही करहुं सब जिवनको भाई।
जीव तुम नहीं ब्रह्मरूप सांई॥ध्रु.॥

चिदाकास आतमकी संगति पंचतत्त्व बन आई।
तेज सो रूप रूप दरसाई।
मान वृत्ति इद्रिय द्वारे ये भोगनको ललचाई।
चौर्याशी लख योनि फिरवाई।
कामिनी धनसुत महाल मंदिर देख जगत चतराई।
अविद्या आतम सुख विसराई।
अलख निरंजन गुरु का डंका सुनले देत दुहाई।
जीव तुम नहीं ब्रह्मरूप सांई॥1॥

पंचभूत ब्रह्मांड पिंड अरु माया मोह बढाई।
ब्रह्म तुम दृश्य की मौज मचाई।
जूं सपनामों राजभोग अरु संपत झूठ लुटाई।
कौन मृगजलसो प्यास बुझाई।
निरंकार शिव शक्ति एक अवधूत सकल जग मायी।
नामरूप ब्रह्मबिना कछु नहीं तुमहिं जीव ईश परमात्मा महिमा बरनी न जाई।
कहो कब निशिनें सूरज छाई।
ज्ञानरूपमार्तांड गुरु सत् बेदबानी समझाई।
जीव तुम नहीं ब्रह्मरूप सांई॥2॥


पद

किति दैव सुकृत हें फळलें।
अजि म्यां परमामृत प्यालें॥ध्रु.॥

बसवुनी सन्मुख अवलोकुनियां।
मानाभिमाना सोडविलें॥1॥

ज्ञानरूप मार्तांडप्रभूसी।
सार्व काल मज जोडविलें॥2॥


पद

देवा मी हो तुमची प्रिय दासी॥ध्रु.॥

ईश महेश ब्रह्म सुख हो कां।
प्रभु तुमच्याविण मी हो उदासी॥1॥

मुक्तिभुवन सुरप्रयाग गंगा।
तूंचि आम्हां त्रिपदी आणि काशी॥2॥

ज्ञानरूप मार्तांड पतीसी।
मी नवरी न वरी आणिकासी॥3॥


पद

शाम कठे जाशी रे संतनके चित्तचोर॥ध्रु.॥

अनादि माया भवप्रवाह जल उचक उचक लहराय।
तामें बसे जीव जगसारा डूबडूब मरजाय॥1॥

दिनानाथ ब्रीद अपनी राखो, तुम पतितनके सर ताज।
कैसे छांड जाओगे हमको बहाँ पकरिसो लाज॥2॥

यहि अरज है सब पतितनकी हृदयकमल रह जाओ।
ज्ञानरूप मार्ताण्ड प्रभु तुम एकरूप दरसाओ॥3॥


पद

जय हो मनोहरनंदन की जय हो॥ध्रु.॥

मातु-पिता भू धन्य देस कुल।
जहाँ प्रगटी छब मोहन की जय हो॥1॥

कौन भाग्य और कौन सुकृत, जिन
आस कथा रस श्रवणन की जय हो॥2॥

जिन प्रताप इह विश्व रचा है।
सुखनिधान उन नयनन की जयहो॥3॥

जो श्रीप्रभु मत सकल उधारन।
नाम रटत उन भक्तन की जय हो॥4॥

मनोहरानुज कहत सुनियो प्रभु।
राखो लाज हम पतितन की जय हो॥5॥


पद

मदहरमदन मनोहरनंदन।
मुनिमानस मलमूल निकृंतन॥ध्रु.॥

कमल नेत्र मुखकमल सुमानस।
कमलधाम कमलाधर खेलन॥1॥

श्रीनखकोटि भानुशशिखंडित।
स्वात्मसुखैक रसात्मक दोलन॥2॥

ज्ञानकिरण मार्तांडरूपधर।
सच्चिदानंदमूलभवभंजन॥3॥


पद

मायाधृत चरणारविंद।
जय जय चिदानंद सुखकंद॥ध्रु.॥

निर्गुण आणि सगुणाकृति दाविसि।
विश्वरूप निजछंद॥1॥

शेष सरस्वति महादेव परि।
तव भजनीं मतिमंद॥2॥

ज्ञानरूपमार्तांड स्वरूपीं।
अतितर घन आनंद॥3॥


पद

स्मर गजाननं मति विकासिनं।
सुखविलासिनं हर जय जय जय।
महामुगुट धारिन् सुरसंकट हारिन्।
नुत विजय कारिन् हर जय जय जय॥ध्रु.॥

एकदंताय तेे नमो नमोऽस्तु ते।
कलिमलापहा भ्रमकलापहा भवत्रितापहा।
शिवसुताय ते मंगलाय ते सुरवरायते।
हर जय जय जय॥1॥

मद विगलित शुंडादंडम्।
खंडितारण्यपाखांडम्।
चित्प्रचुर किरणमार्तांडम्।
शिव (हर) जय जय जय॥2॥


पद

हा कोल खेळा हो।
कठिण ही ग्रंथि खोला हो॥ध्रु.॥

आकाशा रंग नाहीं।
रंगा त्या नांव नांहीं।
मुळींच नाहीं तेंचि सत्य झालें बाबा॥1॥

वंध्येसीं पुत्र नाहीं।
पुत्रा कलत्र नाहीं।
वरचि नाहीं कैंचा वर्हाडी बाबा॥2॥

ब्रह्मीं हें दृश्य नाहीं।
दृश्यासी थारा नाहीं।
भ्रमचि नाहीं कोण बद्ध मुक्त बाबा॥3॥

विभक्त भक्त नाहीं।
भक्तांत द्वैत नाहीं।
माणिकचि हा चिन्मार्तांड बाबा॥4॥


पद

मज हें संत दयेचें देणें।
मज हें साधुदयेचे देणें॥ध्रु.॥

सत्स्वरूपी सहपंचभूत मी।
जग मिथ्या अनुभवणें॥1॥

तुच्छ अनिर्वचनीय ही माया।
स्वरूपीं असंभव पाहाणें॥2॥

नामरूपमल वस्त्रां फेडुनी।
आकाशाचें घेणें॥3॥

स्वानुभवें जाणिव गाळुनी।
निजवस्तूचे घेणें॥3॥

ज्ञानरूप मार्तांड प्रतापें।
स्वरूपी स्वरूपच पहाणें॥4॥

मज हे श्रीगुरु घरीचें देणें॥


पद

पहा किती दैव उघडलें आमुचें।
देखिलें रूप श्रीप्रभुचें॥ध्रु.॥

हा विश्वरूप गिरिधारी।
निजकृपें जीव हे तारी।
ही माय जगां उपकारी।
अति संकट सर्वहि वारि।
मी सकलमतस्थापक हें।
गाजवी ब्रीदही पाही॥1॥

अहो चला चला आम्ही जाऊं।
डोळ्याने रूप हें पाहूं।
श्रीहस्तें प्रसाद घेऊं।
मग जन्मवरी सुखी राहूं।
पूजनें धन्यता लेवू।
स्वस्वरूपसुख हें घेऊं॥2॥

हा सगुण देह श्रीगुरुचा।
मग पहाया न मिळे साचा।
हा कंद निजानंदचा।
ज्ञानरूप मार्तांडाचा॥3॥


पद

नमितों ज्ञानपुंज पदकमलां।
वदतों लीला।
प्रभु हा हरि हा, विधि हा, शिव हा, एकचि झाला॥ध्रु.॥

झाला माणिक करितो निजलीला।
प्रभु हा, हरि हा, विधिहा शिव हा, एकचि झाला॥1॥

सकलमतासीं स्थापक तो गुरु।
भक्त काम पुरवाया सुरतरु।
जगकल्याणीं झाली कथा।
ती ऐका।
मनसा, वचसा, सुरसा, वदतों लीला॥2॥

सच्चिदानंद कंद विजय तूं।
ज्ञानरूप मार्तांड गुरू तूं।
या भवकाननीं दावि पथा।
ती ऐका।
मनसा वचसा सुरसा वदतों लीला॥3॥


पद

योगशक्तिचा वर्णिन महिमा वंदुनि गुरुमाणिका।
झाला विश्वरूप आइका॥ध्रु.॥

विदुरग्रामीं सकलजातिनीं प्रार्थियलें प्रभुवरा।
यावें श्रीप्रभु आमुचे घरा।
ब्राह्मण हो अतिशूद्र स्त्रिया बहु वाईट अथवा बरा।
परंतु सेवक जन हा खरा।
सकलमतासी स्थापक तूं जरि, शमवी आमुच्या भुका।
घ्यावें अद्भुत या लौकिका॥
झाला विश्वरूप आइका॥1॥

ऐकुनि श्रीप्रभु हास्य वदन करि बोले मधुर ध्वनी।
न व्हावें निष्ठुर आपुल्या मनीं।
एक्या कालिंच सदनीं तुमच्या शिष्यांसह येउनी।
द्याल तें घेईन प्रिय मानुनी।
ऐकुनि सर्वहि गेले निजघरा।
पाहती त्या कौतुका॥
झाला विश्वरूप आइका॥2॥

योगशक्तिनें तो प्रभु आपणचि अनेक रूपा धरी।
प्रगटला सर्वांच्या मंदिरीं।
कोठें वस्त्र धन पुष्पचि घेतो, कोठें भोजन करी।
परि तो एकचि सर्वां घरी।
अद्भुत लीला श्रीप्रभुची ही न वर्णवे ब्रह्मादिकां॥
झाला विश्वरूप आइका॥3॥

अन्य गृहांप्रति अन्य येउनि श्रीप्रभूसी पाहिलें।
पाहतां स्वगृहींहि देखिले।
विदुरग्रामीं विश्वरूपधृत श्रीप्रभु अवलोकिले।
ऐका अद्भुत हे वर्तलें।
ज्ञानरूप मार्तांडगुरु हा खेळ दाविला निका॥
झाला विश्वरूप आइका॥4॥


पद

धन्य धन्य अति धन्य आम्ही।
श्रीमाणिकपदीं लीन आम्ही॥ध्रु.॥

श्रीमाणिकपदीं लीन रहा।
ब्रह्मलोक हें तुच्छ पहा॥1॥

जन्ममृत्युभ्रम उधळीतो।
सच्चिदानंद आम्ही होतों॥2॥

ज्ञानरूप मार्तांड पहा।
निर्विकल्प होऊनी रहा॥3॥


पद

ज्याचा देहचि निर्विकल्प गाजे।
ज्यासी सद्गुरु नाम हें साजे।
ज्यासी पाहतांचि आत्मबोध माजे।
हेचि अवधूत श्रीदत्तराजे॥ध्रु.॥

ज्याच्या दृष्टीसी ही सृष्टि नाहीं।
ज्याच्या कृपेचा चोज सांगू कायी।
देहभोग विदेह सुख लाही।
रूप पाहतांचि ब्रह्मसुख लाजे॥1॥

ज्ञानमार्तांड हा उगवला।
मूळ जीवा अज्ञान ग्रासियेला।
आहे नाहीं हा एक दादूला।
एक छत्र स्वरूप विराजे॥2॥


पद

भज नुतसुरमौली जन हो।
श्रीमाणिक पदरजधूली घे।
आत्मसुखा घे स्वात्मसुखा॥ध्रु.॥

नाटकी हा अवधूतचि नटतो।
विधि हर वनमाली॥1॥

निजानंद प्रियधामा रामा।
निर्गुण गुणशाली प्रभु हा॥2॥

पूर्ण कृपें चिन्मार्तांडोदयीं।
बोधस्फूर्ति हरली जन हो॥3॥


पद

कमलेशवर प्रिय हो हे मानस।
कमल करस्थित हो हे मानस।
सहस्रदल चित्कमली जो शिव।
प्राण मदात्मा हो हे मानस।
कमल शिवालय हो हे मानस॥ध्रु.॥

षट्कमलीं विहरो हे मानस।
प्रपंच मद विसरो हे मानस।
ब्रह्मकमल मकरंद सुधारस।
मधु सेवनीं रत हो हे मानस।
कमलपदीं नत हो हे मानस॥1॥

कमलासनीं स्थिर हो हे मानस।
जन्म शिवार्चन हो हे मानस।
सिंहनाद शिवगर्जनें भ्रमगज-।
गंड विदारण हो हे मानस।
कमल शिवार्पण हो हे मानस॥2॥

वंशकमल विकसो हे मानस।
शिवयश गानीं असो हे मानस।
शिवमार्तांड सदय हृत्कमली
सफल हें जीवन हो हे मानस।
सकल कमलरूप हो हे मानस॥3॥


पद

नमो पूर्ण सुखभरित चैतन्यधामा।
सच्चिदानंद गुरु सार्वभौमा॥ध्रु.॥

एक सद्वस्तु घन अविट अज निजरूप।
अनृतमय जगदखिल भावशून्य।
सिद्ध सिद्धांतपर सूक्ष्मतर निर्मला।
निष्कला स्वानुभव वेदमान्या॥1॥

पंचभूत त्रिगुणरहित गुणसाम्यसम।
विषम अति शांति गुज निर्विकारा।
योगिजन साम्राज्यपट अतिमौनपद।
भूत भवदृश्य संसारसारा॥2॥

निश्चल निरालंब निर्विकल्पाकाश।
निगमनत नेति नेतीति शुद्धातिनित्य
नूतन निजानंद गुरु अवधूत।
निरतिशय ज्ञानमार्ताण्ड बोधा॥3॥


पद

काय जीवा हा भ्रम आहे।
मी ब्रह्म नव्हे तरि जीव आहे।
मीपण हें चेतन आहे।
परि व्यर्थ मूर्ख जन भ्रमलाहे॥ध्रु.॥

ब्रह्म नव्हे तूं कोण आहे।
आणि विषय स्फूर्ति सुख का आहे।
मी म्हणतां जें सुख आहे।
हें निजानंद ब्रह्मचि आहे॥1॥

नरनारी जग कोण आहे।
तरि अस्ति भाति आणि प्रिय आहे।
नामरूप कल्पित आहे।
हा अनुभव सर्व जगां आहे॥2॥

माया जग कोठें आहे।
हें चिन्मार्तांडोदयीं पाहे।
भक्त जनां परि नटलाहे।
हा चिन्माणिक एकचि आहे॥3॥


पद

दृश्य पाहूं जातां ब्रह्मचि हें दिसतें।
खचित बाई चिद्रूप हें दिसतें।
खचित बाई सद्रूप हें दिसतें।
खचित बाई प्रिय रूप हें दिसतें॥ध्रु.॥

अमित गोल जडभूत शोधितां।
चित्सत्ता कळते॥1॥

जागृति स्वप्न सुषुप्ति जाणतें।
एकचि चेतन तें॥2॥

इन्द्रियभोग विषयीं जें सुख तें।
निजानंद स्फुरतें॥3॥

यापरि सकल जगासि शोधिता।
चिदानंद गमतें॥4॥

सत्सुख चिन्मार्तांड स्वरूपीं।
मृगजल हें नटतें॥5॥


पद

सख्या हा वैभव दो दिवसांचा।
कनक कांति मदनांचा॥ध्रु.॥

क्षणाक्षणा आयुष्य जात हें वाया।
समय कठिन मरणाचा॥1॥

नाशवंत जग क्षणिक दृश्य हें।
मनिं आठव धरी याचा॥2॥

ज्ञानरूप मार्तांड कृपेनें।
चिन्माणिक भेटेल साचा॥3॥


पद

दु:ख स्थिर भोग हा नाहीं मजला।
निद्रासुखें नित्य प्राणि रमला॥ध्रु.॥

वृत्ति दु:खाकार जोंवरी, तोंवरी
कुष्ठ व्रण दाहादि स्वानुभव सांगे।
देहीं व्रण असुनियां वृत्तिलय झालिया
सहज स्वानंद सुखी शांत गमला॥1॥

अज्ञ भयभीत हो काष्ठ व्याघ्रासिया।
ज्ञानसंपन्न सानंद क्रीडे॥
ईश सुर मुनिजन्म विश्व सौख्यादेत।
मज मृत्यु मी देहीं मानुनी शिणला॥2॥

दु:ख विपरीत सुख शांति क्रोधा वैर।
तेज तम वैर हा स्पष्ट भासे।
हीन बलि भयचकित रण वीर तन त्यजित।
वृत्ति गुण दोष हा पूर्ण ठसला॥3॥

वृत्ति व्यापार सह, वृत्तिस्थिति लय जन्म।
भासवी जाणता मी चिदात्मा।
वृत्तिभोगी दु:ख, ती क्षणिक मी अमर।
नित्य निरपेक्ष मार्तांड स्फुरला॥4॥


पद

नेति नेति नाहीं येथें शास्त्रप्रसंग।
आत्मा असंग।
नको कुसंग।
साधुचा संग।
मन बुद्धि चित्त वाणीचा नाहीं आम्हा संग॥ध्रु.॥

आम्ही कूटस्थ देहा जन्म आहे।
जलीं आकाश अलिप्त राहे।
ज्ञानरूपी ज्ञातता न साहे।
येथें पाहिजे जातीचें स्वानुभव अंग।
आत्मा असंग।
नको कुसंग।
साधुचा संग।
मन बुद्धि चित्त वाणीचा नाहीं आम्हा संग॥1॥

आम्ही जन्मोनि नाहीं जन्म आम्हां।
वृद्धि सूतक नाहीं स्वप्न जन्मा।
शब्द संबंध नाहीं परब्रह्मा।
चिन्मार्तांड जलिं जग भासे तरंग।
आत्मा असंग।
नको कुसंग।
साधुचा संग।
मन बुद्धि चित्त वाणीचा नाहीं आम्हा संग॥2॥

बहुपुण्य हा दिन उगवला।
शिव साम्राज्य पदीं जीव आला।
अहा आनंदी आनंद झाला।
खेळू गुलाल श्रीगुरुपूर्ण बोधाचा रंग।
आत्मा असंग।
नको कुसंग।
साधुचा संग।
मन बुद्धि चित्त वाणीचा नाहीं आम्हा संग॥3॥


पद

कां कुणावरी कोप हा बाबा।
कां मीपणीं प्रेमा जडला।
नरनारी जगदाकृति एकचि।
चेतन प्रभु शिव हा नटला॥ध्रु.॥

अनंत प्रकृति स्वभावरत जन
अधमोत्तम विषयीं रमला।
न्यायवाक्य श्रीकृष्ण वदे हो
मुनि योगी निग्रही फसला॥2॥

शुक वसिष्ठ सनकादिक गण हा
जीवन्मुक्ति सुखा शिणला।
जीव जंतु निद्रा समयीं हो
सहज मुक्त ब्रह्मीं मुरला॥1॥

चित्त प्राणाकर्षणीं महंत देह
बुद्धि हटयोगी थकला।
नित्य चिदाकर्षित जग जाणुनि
लय योगी ज्ञानी बनला॥3॥

विदेह मुक्ति प्रारब्धक्षय
वांच्छित ज्ञानीं बहु श्रमला।
अलिप्त स्वस्वरूपीं जग स्थिती लय
मानुनि मुनि करी निज लीला॥4॥

गुण स्वभाव बल काल ज्ञाता
जनहितधर्मा ज्या स्तविला।
अन्य कालगुण स्वभावभेदें
अनहित जाणुनि तो त्यजिला॥5॥

ईशकृपा वांच्छित स्वस्वमति
वंद्य निंद्य (विधि-निषेध) वचनीं भ्रमला।
सकलमत प्रभु एक जो जाणें
तो जगि सकलमतीं नमिला (पूजिला स्तविला )॥6॥

मोक्ष सिद्ध सत्कर्म धर्म गुरु
शास्त्र जाल बंधनिं विटला।
सकलमत स्थापक शिव माणिक
चिन्मार्तांड पदीं मुरला॥7॥


पद

अभाग्याच्या हृदयीं मीपणीं परब्रह्म स्फुरले।
परि त्या लोटुनि या जडदेहीं मीपण हें जडले॥ध्रु.॥

मी देही जड जीव ज्ञान हें केविं होत समजा।
जागृति स्वप्न सुषुप्ति जाणते कोण तुम्हीं उमजा।
मन इंद्रिय मुरडोनि प्रेरितां स्वहित विषय काजा।
आत्मशक्ति बल सर्व जाणतां म्हणतां मज न कळे॥1॥

आत्मतेज मन विवर्त कीटक दृश्य जाल स्फुरवी।
ऊर्णनाभि मृगवारि अभ्र जसें कोश पंच नटवी।
स्वात्मशक्ति वृत्ति प्राण निपजुनि विषयीं मना रिझवी।
ज्ञानसिंधु लाटा पाहुनी जन स्वात्मरूपा भुलले॥2॥

श्रुति प्रज्ञानंब्रह्म हे गर्जंति विषयीं हो ऐका।
शब्द रूप रस गंध ज्ञान हे ब्रह्मतेज कणिका।
मीं तूं पण सुख दु:खाकृति ही माया भव क्षणिका।
ईश जीव जड दृश्याकृति ही ब्रह्म तेज भरलें॥3॥

कोण बद्ध कोण मुक्त ज्ञानी अनुभविं हो बोला।
अमत ब्रह्म तोचि मुक्त सहजि वेद पुरुष वदला।
वसिष्ठ रामा वदे स्वप्नि जशी कथा जननि बाला।
चिन्मार्ताण्ड प्रसादें मींपणी ब्रह्म पूर्ण ठसलें॥4॥


पद

अस्ति नास्ति कुणि म्हणा परंतु, तें आहे बा तें आहे।
चेतन जड कुणि म्हणा परंतु
(ईश जीव जड म्हणा परंतु) तें आहे बा तें आहे॥ध्रु.॥

ज्यामुळें हे मिथ्या म्हणती।
मौन वाच्य प्रतिपादिती।
निश्चय अनुभव असो नसो परी।
तें आहे बा तें आहे॥1॥

जो शून्य निधि शोषवी।
मींपणीं रूप प्रगटवी।
नास्तिका प्राण जीववी।
नेति नेति श्रुति सौभा़ग्यप्रद।
तें आहे बा तें आहे॥2॥

जाणिवे क्रिये नातुडे।
वाच्य लक्ष तर्कही खुडे।
वेदहि थकती बापुडे।
नाहीं पण वृत्तिही बुडे परि।
तें आहे बा तें आहे॥3॥

निरपेक्ष स्फुर्तिचे स्फुरणें।
नि:शंक स्वानुभव वदणें।
सत्यानृत हें भाषणें।
ब्रह्म जीव शून्य साक्षि अवघें।
तें आहे बा तें आहे॥4॥

स्वरूप चिन्मार्ताण्ड प्रकाशे।
शब्द मौनपणही ग्रासे।
अस्ति नास्ति विकल्प नासे।
अनंत नामे भजा परंतु।
तें आहे बा तें आहे॥5॥


पद

मी चेतन, चंचल नांहीं।
मला समाधि नको ग बाई॥ध्रु.॥

आत्मशक्ति हें मन।
शांति विक्षेप मन।
बंधमोक्ष हें मन।
या मनाशीं नामरूप नाहीं।
मला समाधि नको ग बाई॥1॥

चिन्मार्ताणड प्रचंड।
सिंधुलहरी उदंड।
मन आत्म्याशी भेदची नाहीं।
मला समाधि नको ग बाई॥2॥


पद

तोचि धन्य जन्मा आला।
जो कां सकलमतीं वंदिला॥1॥

एका देवा आदरावें।
अन्य देवा कां निदावें॥2॥

विश्वरूपीं देव राजा।
नाना वेषीं भक्तकाजा॥3॥

जलिं तरंग नभीं वारा।
नामरूपाचा पसारा॥4॥

दिवस घटिका पळ पळ जाणा।
जन्म नाश मनीं आणा॥5॥

विश्वरूपीं पांडुरंग।
घडी घडी पालटे रंग॥6॥

गुण उपासना अनंत।
एक चालक चेतन संत॥7॥

विषय सर्व विठ्ठलार्पित।
जगिं तोचि सहज मुक्त॥8॥

ज्ञान मार्तांड हा भाव।
सकल घटीं माणिक देव॥9॥


पद

भक्त देऊळाशीं गेला।
हृदयीं देव विसरला॥1॥

देव चालक शरीरांतरि।
भक्त देवा हाका मारी॥2॥

भक्त ठेवी नैवेद्यासीं।
देव अंतरि उपवासी॥3॥

भक्त देवा लागी शिणे।
देवा वाटे लाजिरवाणें॥4॥

झाली देवा भक्ता भेटी।
तुटे जीवपणाची गांठी॥5॥

ज्ञानमार्तांडाची लीला।
भक्त अवघा देव झाला॥6॥


पद

कोण विपरीत प्रसंग ओढवला।
सार्वभौम आला भिक्षा मागे॥1॥

पूर्ण परब्रह्म मागे विषय भिक्षा।
जन्ममरण शिक्षा अज्ञान संगे॥2॥

स्वप्निं गेल्या जीवा सती गेली विधवा।
मूर्ख संशय भावा सोडवी देवा॥3॥

आत्मा अविनाशी विषय प्रकाशी।
इद्रिय भोग ग्रासी जागृति स्वप्नीं॥4॥

विषय भोग नाना चिदात्मा मळेना।
जन्मेना नासेना मानस धर्मे॥5॥

जड ना संसारीं आत्मा निर्विकारी।
भोग भ्रांति वारि गुरु बोध वचने॥6॥

ईश जीव मी मी विषय भोगी मी मी।
मजमाजीं मी मी स्फुरतो आत्मा॥7॥

सकलमती भेटे अस्ति नास्ति प्रगटे।
लोटितां न लोटे ज्ञानमार्ताण्ड हा॥8॥


पद

जय हो सकलमतीं, तुम्हां जगिं मान्यता।
पूज्यता सज्जन सुवंद्यता॥ध्रु.॥

स्वतंत्रता अखिल जनीं बोध सत्ता।
धीमता अनुपम शम शांत चित्तीं निरहंता॥1॥


पद

हा सोहं हंसराट् म्हणे मी मी मज पहा॥ध्रु.॥

ज्या सत्तें वायु मिरवे।
भय कंपे सूर्य उगवे।
इंद्राग्नि मृत्यु धावे।
रौद्राभा उग्रतम अति
दृग् भूता प्रकाश हा॥1॥

नभशक्त्या मेघ वृष्टी
वेदांती दृष्टी सृष्टि।
नकळे जे होती कष्टी।
ब्रह्मादि स्तंभ भासे।
शिव चिन्मार्ताण्ड हा॥2॥


पद

मुक्ता ना गिद्दो अण्णा, मुक्ता नी इद्दो तम्मा।
नी मुक्ता नानु मुक्ता जगसहीत जंगम मुक्ता॥ध्रु.॥

पंचभुतादिगळु सुळ्ळेनें काणवंदु।
ऊरु इल्लदे शींवीं इल्लि काण्यादो तम्मा॥1॥

वंध्याना पुत्रागळु मुगिल पुष्पवु हाकी।
प्राण इल्लदे काणिसी राज्या माड्यादो तम्मा॥2॥

अज्ञानकत्तलदल्लीं ना नीनु बद्धा मुक्ता।
ज्ञानमार्तांड बेळगी सुम्मने नी आगो तम्मा॥3॥


पद

सच्चिदानंद गुरु एकही साच और
इतर गुरु झूठ पहचानले रे मना।
माया विलास सब नाम और रूप त्यज
सकल जग परब्रह्म देखले रे मना॥ध्रु.॥

वोही जगरूप और वोही गुरुभूप मन
जीव शिवभूत पंचक त्रिगुण सारा।
एक सद्रूपही बहुविधा होत है
श्रुतिवाक्य वेदांत मान ले रे मना॥1॥

छांड शबलार्थ को शुद्ध सो ग्राह्य कर
भाग लच्छन महावाक्य साधे।
ब्रह्म जो जाने सो ब्रह्मही होत है
निगम डंकार सुन बूझले रे मना॥2॥

नित्यसो सत्य औ’ ज्ञान चैतन्य सुख
परम अत्यंत आनंद साजे।
अचल अविनास अज एक अवधूत गुरु।
ज्ञानघन मार्तांड जान ले रे मना॥3॥


पद

दिवाना आपकु नहि धूंडा॥ध्रु.॥

विद्या सीखी जोग कमाया।
भगवा सिर मूंडा॥1॥

ग्यानी बन चित्त भोगकी आशा।
साधु जग भोंडा॥2॥

बंध मुगति नहीं ब्रह्म तूं साचा।
क्यों रोता रंडा॥3॥

आत्मभूमिबल मन फल फुली।
शरीर जडकुंडा॥4॥

त्यज विरोध मत, सकलमती हो।
तबहो दिल थंडा॥5॥

चिन्मार्ताण्ड बचन जो भूला।
खावे जम दंडा॥6॥


पद

झलक मुँह दिखा झट छुपा चाहते हो।
मिले हो जो दिल से कहाँ जाते हो॥1॥

मै बंदा हूँ दुश्मन या आशिक तुम्हारा।
मैं मैं हूँ या तुम हो जुदा जानते हो॥2॥

खुदाई खुदाको न छोड़ेगी हरगिज़।
शक्ल हम नहीं कुछ तो क्या जानते हो॥3॥

मोहम्मद या अहमद या मानीक बंदा।
तुम्ही जो चाहे सो बन आते हो॥4॥


पद

हाय गफलत में हूँ मैं कैसा मुझे मैं भूल गया हूँ।
ख्वाहिशें दिल की मिटाने हरसू दौड़ रहा हूँ॥ध्रु.॥

शाह वज़ीर है दिल मैं हूं मालिक दिल का।
दिल से ही दीन दुनिया ताबे दिल के हुआ हूँ॥1॥

हुबाब नूर है दिल, मै हूं दरयाएजलाल।
मौज दरया का तमाशा मै खुदी को खो दिया हूँ॥2॥

आंखों में नूर मुहम्मद दिल तो है खाने खुदा।
मैंपने का ढंग मचा के मन्नते माँग रहा हूँ॥3॥

खुल गया चश्म हकीकी कल्मे गय्यब को समझा।
लाइलाह इल्लिल्ला मे खुदबखुद फना हुआ हूँ॥4॥

मैं न हिंदू न मुसलमाँ हूँ मै मानिक का प्यारा।
मजहबे सूफी का बया कोई कहा न मैं कहा हूँ॥5॥


पद

खुदा के वास्ते मुझ में खुदा बता देना।
ये मैं का गफलत परदा जरा उठा लेना॥ध्रु.॥

ये नूर किसका है हर चश्म में चमकता है।
रसूल, महल मुबारक तवाफ कर लेना॥1॥

तुम्हे नसीब हो मेराज शबे मुबारक हो।
ये जिब्रइल है दिल आपसा बना लेना॥2॥

वो लाशरीक हूँ अल्लाह में खुद फना भी फना है।
ये जोश वस्ल निशाने खुदी मिटा देना॥3॥

न बंदा हूँ न मानिक हर रंग मे खुदा ही खुदा है।
फकीर सूफी का नाजुक बयान सुन लेना॥4॥


पद

खुदा गर दे नजर तुमको, तो हर सूरत खुदा की है।
जमर्रुुद गौहर औ’ शमशीर, मगर इक आबदारी है।
न आतिश ज़ात से रौशन न सूरज चांद तारे हैं।
ये सिफते जिससे हैं रोशन वो इक नूरे जलाली है॥1॥

न मादर खाला औ’ हमशीर न दुलहन दुखतरो माशूक।
जिस्महै इक जो इनसानी ये सब दिल की दलाली है॥2॥

खुदा गर तुम नही होते तो क्यों होती खुदी पैदा।
खुदी मैं है जो खुदमस्ती खुदा की ये निशानी है॥3॥

खुदाई का ये जल्व ऐ नूर मेहबूब मानिक औ बंदा।
फनाकर खुद को अल्लाह मे तू वाहद जात बारी है॥4॥


पद

वो लाशरीक अल्ला हर दिल जगा रहा है।
माशूक इश्क आशिक जल्वा दिखा रहा है॥ध्रु.॥

क्या खूब है बहाना दुनिया में मर्दो जनका।
इश्के मजा खुदीका अल्लाह (खुद ही) लुटा रहा है॥1॥

मंदिर में बिरहमन मसजिद में अहले इस्लाम।
नाजो अदा से अपने माशूक बना हुआ है॥2॥

आशिक हुआ जो मजनू लैला मे खुद फना।
तू हो फना खुदा मे देखो तो क्या मजा है॥3॥

ऐ बंदे शाह अहमद मानीक चिराग दुनिया।
रोशन है कुफरो इस्लाम अल्लाह से क्या जुदा है॥4॥


श्री माणिकप्रभु महामंत्र (आर्या)

श्री प्रभुकृपा विनोदें, होईल जगबद्ध मुक्त नित्य पहा।
जाळिल भ्रम प्रमासह, छेदुनि भव विधिनिशेध पादप हा॥1॥

गुप्तात्म लाभ देहीं, श्रीगुरु बोधां जनेंचि शोधावा।
अतितर तत्त्व विवेकें, प्रत्ययरूपे सुजीव बोधावा॥2॥

रूप रहित घन ब्रह्मीं, मायिक अवकाश बहुगुणी गमला।
तेथुनि मन जाणिव हे, चित्त अहंकार मीपणें भरला॥3॥

मायिक सूक्ष्म भूतीं हो, स्वाभाविक सकल अंश जाणावा।
नसता क्रम स्वार्धांशीं, केंवी पर अष्टमांश मिळवावा॥4॥

णी बिंब जीव ईश, स्वरूपा म्हणती परंतु हें न घडे।
वंध्यासुतकृत घटिं त्या, मृगजलिं हें सूर्यबिंब केंवि पडे॥5॥

कल्पित स्वप्नीं व्याघ्रा, माराया सत्य शस्त्र नच लागे।
तेंवी तत्त्वमसि या बोधेंविण, स्वस्वरूप नच जागे॥6॥

जहति असंभव अजहति, जाणुनि मग भाग त्याग करुनि पहा।
टाकुनिया वाच्यांशा, लक्ष्यांशासीं जीव पूर्णब्रह्म पहा॥7॥

यजमानत्व स्वदेहत्रयीं, दावी बंध मोक्ष जीवा या।
सदसद्विवरण करि जरि, तरि हरी गुरु शास्त्र होत जीवा या॥8॥

गुज हें ऐक सख्या, नभ नील सदृश तुच्छ दिसे पाहीं।
श्रुति नेति-नेति वाक्यें, बोधिति भवदृश्य हें मुळीं नाहीं॥9॥

रुक्मवर्ण सुख भूमा, निज तेजें निखिल भास भासवितो।
सविता हा जग साक्षी, सह त्रिपुटी विश्वधी नियामक तो॥10॥

मान मेय सह माता, भ्रम कल्पित वृत्ति व्याप्ति निजबोधा।
आनंद भोग ब्रह्म, स्फूर्तिरहित निर्विकल्प ते शोधा॥11॥

णीत्वपणा व्यक्तरेकें, पाहतां पाहाणें न जाणणें कांहीं।
जरि अज्ञाना जाळी, शाब्दिक हें ज्ञान स्वानुभविं नाहीं॥12॥

कर्ता योग्य नसे तरि, कार्य कसें पूर्ण सत्य मानावें।
नसोनि जरि भासतसे, मायिक हें अनृत व्यर्थ जाणावे॥13॥

जन्य सुख क्षणिक हें, शोधा उन्मनि समाधि ही त्यागा।
शांत उदास सहज स्थिति, निर्मल नि:संग होउनी भोगा॥14॥

यक्षरूप धरितो प्रभु, श्रीमाणिक नामरूप अपवादा।
भासवुनी सकलमतां, स्वमत पथें नेई शीघ्र जो स्वपदा॥15॥

जय जय हो जनक निजानंद जरा जन्म जर्जतीकृत भो।
नभतलमल सदृश, अखिलजगज्जालमूलनाशक भो॥16॥

यज्ज्ञामृत सेवुनि, हरिहर घनचित्सुखांत बुचकळती।
दृश्यात्मक जग आपणचि, हें सुख घेण्या पुन्हा उचंबळती॥17॥

मा मा गा अन्य कथा, पुनरागमनार्थ शुष्क हे श्रम कां।
सकल मतां प्रभु हा तारि, स्वाश्रमस्तुति निंद्य अन्य आश्रम कां॥18॥

णी स्वरूप (ण:) इ माया, म: शंभु हा अकार विष्णु पहा।
क ब्रह्मदेव ऐसा सर्वात्मक एक पूर्ण माणिक हा॥19॥

कल्पवृक्ष हा दृश्या, साधक सर्वार्थ वृत्ति भासवितो।
तन्नाम ग्रहण करी जो, त्यासि सुखें निर्विकल्पिं नांदवितो॥20॥

मनन करी स्तोत्रा जो, श्रद्धेनें त्या मिळेल गुप्त पथ।
अनृत वदो तरी, हो कां निर्दय तो प्रभु आह्मास ही शपथ॥21॥

ज्ञानरूप मार्तंड स्फूर्ति ही निज सुखांत अवतरली।
निश्चित जनक पाहुनि सद्भक्तातें स्वयंवरें वरिली॥22॥


मुक्तानंद लहरी

जगीं पाहे नामाकृति पुरुष अती सुंदर स्त्रिया।
सुवेशीं आभरणें नटति परि तें चित्रचि तया।
स्वयें साक्षी क्रीडा करित असता आणि रमता।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥1॥

कधीं देवालयीं हो कधिं घरिंच माडीवरीं बसे।
कधीं शैलाग्रीं हा कधिं क्वचित खेळे नदितटीं।
कधीं संतोषाने वसत ॠषिच्या पर्णकुटकीं।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥2॥

वनीं वृक्षा पाहे दलफलभरें नम्र दिसती।
बहुच्छायापक्षीगण मधुर शब्दें सुखविती।
बसे रात्रीं दिवसा शयन करि भूमंचकिं सुखी।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥3॥

कधीं विद्वासांसी अति सुरस आनंद रसिकीं।
कदाचित् काव्यालंकृत मधुर वाणी सुखविती।
वदे तर्का युक्ती श्रुति बहु सुतर्कें च हटवी।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥4॥

कधीं दिव्य स्त्रीच्या मुखकमलिं ग्रासाप्रति स्वयें।
सुखें घाली घेईं स्वमुखिं मग ठेवी मुख मुखीं।
अभेदाद्वैताचा स्वरूप महिमा तो प्रगटवी।
मुनी तो मोहेना निजगुरुकृपें ज्ञान पदवी॥5॥

मौना मौन दिसे गुणींत गुणि हा पंडिति पंडीतसा।
दीना दीन दिसे सुखींत सुखि हा भोगींत भोगी दिसे।
मूर्खां मूर्ख असा स्त्रियां तरुणसा वक्त्यासि वक्ता दिसे।
तो हा धन्य जगीं सुखी त्रिभुवनीं जोऽवधूताऽवधूत॥6॥


श्लोक

गुरुदत्तात्रय, सव्यभागीं शिव हा श्रीचित्कला पार्वती।
वामांगीं प्रिय श्रीनिवासप्रभु हा, रुद्रप्रभू मारुति।
अज्ञानांध वितंड नाशक पहा, मल्लारिमार्तांड हा।
अंतीं विठ्ठल पांडुरंग भजनीं लाभें सुखें मोक्ष हा॥1॥